डॉ. भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार
मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला आज केवल एक विवादित परिसर नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, ज्ञान परंपरा और सभ्यतागत अस्मिता का प्रतीक बन चुकी है। हिंदू पक्ष के अनुसार भोजशाला मूलतः राजा भोज द्वारा स्थापित माँ वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर एवं संस्कृत शिक्षा का महान केंद्र था। समय के साथ हुए आक्रमणों, राजनीतिक परिवर्तनों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के कारण इसके मूल स्वरूप को बदलने का प्रयास किया गया, किंतु उपलब्ध ऐतिहासिक, पुरातात्त्विक और विधिक साक्ष्य आज भी इसके हिंदू स्वरूप की पुष्टि करते हैं।
इसी संदर्भ में आज इंदौर खंडपीठ द्वारा आए निर्णय ने भोजशाला से जुड़े विमर्श को एक नई दिशा प्रदान की है। न्यायालय की टिप्पणी और सुनवाई ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि भोजशाला विवाद केवल धार्मिक भावनाओं तक सीमित नहीं, बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों, पुरातात्त्विक साक्ष्यों और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। हिंदू पक्ष इसे लंबे समय से सांस्कृतिक न्याय और ऐतिहासिक पुनर्स्थापन के संघर्ष के रूप में देखता रहा है।
हिंदू पक्ष का सबसे महत्वपूर्ण आधार इतिहास है। परमार वंश के महान शासक राजा भोज भारतीय इतिहास में केवल एक राजा नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कृति और शिक्षा के संरक्षक माने जाते हैं। माना जाता है कि उन्होंने 1034 ईस्वी के आसपास भोजशाला की स्थापना की थी। यह स्थान केवल पूजा का केंद्र नहीं था, बल्कि संस्कृत, वेद, व्याकरण, ज्योतिष, खगोल विज्ञान और भारतीय दर्शन के अध्ययन का प्रमुख विद्यापीठ था। भोजशाला भारतीय ज्ञान परंपरा का जीवंत केंद्र थी, जहाँ विद्वानों और विद्यार्थियों का सतत आगमन होता था।
पुरातात्त्विक साक्ष्य हिंदू पक्ष के तर्कों को और अधिक मजबूत बनाते हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्टों तथा उत्खननों में प्राप्त अवशेषों में संस्कृत व्याकरण शिलालेख, शिक्षण चक्र, संस्कृत श्लोक, नागाकार व्याकरण चित्र और मंदिर स्थापत्य के अवशेष प्राप्त हुए हैं। यदि यह स्थल केवल मस्जिद होता, तो संस्कृत शिक्षा और वैदिक अध्ययन से जुड़े इतने व्यापक प्रमाणों की उपस्थिति स्वाभाविक नहीं मानी जा सकती। उत्खननों में विष्णु प्रतिमा के अवशेष, मंदिर शैली के स्तंभ और प्राचीन धार्मिक संरचनाएँ भी प्राप्त हुईं, जो इसके हिंदू स्वरूप की ओर संकेत करती हैं।
ब्रिटिश कालीन अभिलेख और विदेशी इतिहासकारों के विवरण भी हिंदू पक्ष के समर्थन में प्रस्तुत किए जाते हैं। ब्रिटिश विद्वान कैप्टन सी. ई. लुआर्ड ने अपनी पुस्तक “Dhar and Mandu” में उल्लेख किया कि यह संरचना मूलतः हिंदू मंदिर के अवशेषों से निर्मित की गई थी। उन्होंने यह भी लिखा कि संस्कृत शिलालेखों को जानबूझकर फर्श में लगाया गया ताकि उन पर चला जा सके। इम्पीरियल गजेटियर तथा रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के अभिलेखों में भी भोजशाला को मूलतः हिंदू मंदिर माना गया है, जिसे बाद के काल में परिवर्तित किया गया।
हिंदू पक्ष माँ वाग्देवी की प्रतिमा को भी एक महत्वपूर्ण प्रमाण मानता है। ब्रिटिश काल में खुदाई के दौरान देवी सरस्वती की प्रतिमा प्राप्त हुई थी, जिसे बाद में इंग्लैंड ले जाया गया। वर्तमान में वह प्रतिमा ब्रिटिश संग्रहालय से संबंधित बताई जाती है। यदि भोजशाला का मूल स्वरूप मस्जिद होता, तो देवी सरस्वती की प्रतिमा और संस्कृत शिक्षण सामग्री की उपस्थिति तार्किक रूप से प्रश्न खड़े करती है। यही कारण है कि हिंदू समाज लंबे समय से माँ वाग्देवी की प्रतिमा को पुनः भारत लाने और भोजशाला में स्थापित करने की मांग करता रहा है।
विधिक दृष्टि से भी हिंदू पक्ष अपने तर्कों को मजबूत मानता है। भोजशाला 1904 तथा 1958 के प्राचीन स्मारक संरक्षण कानूनों के अंतर्गत संरक्षित स्मारक मानी जाती है। हिंदू पक्ष का तर्क है कि एक संरक्षित स्मारक का मूल ऐतिहासिक स्वरूप ही उसकी पहचान का आधार होना चाहिए। केवल बाद के उपयोग से किसी स्थल का मूल धार्मिक चरित्र समाप्त नहीं हो सकता।
पूजा स्थल अधिनियम 1991 को लेकर भी हिंदू पक्ष महत्वपूर्ण कानूनी तर्क प्रस्तुत करता है। उनके अनुसार यह अधिनियम उन प्राचीन और संरक्षित स्मारकों पर लागू नहीं होता जो पुरातत्व संरक्षण अधिनियमों के अंतर्गत आते हैं। चूँकि भोजशाला एक संरक्षित स्मारक है, इसलिए इस पर 1991 कानून की बाध्यता स्वतः लागू नहीं होती।
1935 के तथाकथित “एलान” को लेकर भी हिंदू पक्ष प्रश्न उठाता है। उनका कहना है कि यह केवल प्रशासनिक आदेश था, कोई वैधानिक अधिसूचना नहीं। इसलिए इसे संवैधानिक और कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं माना जा सकता। हिंदू पक्ष यह भी कहता है कि संविधान के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत उन्हें माँ सरस्वती की पूजा और धार्मिक अनुष्ठान का मौलिक अधिकार प्राप्त है।
भोजशाला विवाद का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या केवल उपयोग के आधार पर किसी संरचना का मूल चरित्र बदल जाता है? हिंदू पक्ष का स्पष्ट मत है कि यदि किसी स्थल के मूल पुरातात्त्विक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक साक्ष्य मंदिर और वैदिक शिक्षा केंद्र होने की पुष्टि करते हैं, तो बाद के राजनीतिक अथवा प्रशासनिक उपयोग से उसकी मूल पहचान समाप्त नहीं हो सकती।
वैज्ञानिक दृष्टि से भी भोजशाला भारतीय ज्ञान-विज्ञान की प्राचीन परंपरा का केंद्र प्रतीत होती है। यहाँ प्राप्त व्याकरण चक्र, शिक्षण संरचनाएँ और संस्कृत शिलालेख यह संकेत देते हैं कि यह स्थान केवल धार्मिक पूजा तक सीमित नहीं था, बल्कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था और ज्ञान परंपरा का संगठित केंद्र था। इस कारण भोजशाला का महत्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, शैक्षणिक और सभ्यतागत भी है।
आज इंदौर खंडपीठ के निर्णय के बाद भोजशाला का प्रश्न एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आ गया है। हिंदू समाज इसे केवल भूमि या भवन का विवाद नहीं मानता, बल्कि इसे भारतीय सभ्यता, सांस्कृतिक चेतना और ऐतिहासिक न्याय से जुड़ा विषय मानता है। उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेख, पुरातात्त्विक साक्ष्य, विदेशी इतिहासकारों के विवरण और संवैधानिक तर्क हिंदू पक्ष को यह विश्वास दिलाते हैं कि भोजशाला का मूल स्वरूप हिंदू धार्मिक एवं शैक्षणिक केंद्र का था और उसे उसी स्वरूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।