एक मई का सच: श्रमिक दिवस या इतिहास की परतों में छिपा एक विवादित छल ?

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    01-May-2026
Total Views |
श्रम दिवस

 
 डॉ. मयंक चतुर्वेदी
पत्रकार  
 
 
भारत में एक मई का दिन आते ही ‘मजदूर दिवस’ के नाम पर औपचारिक कार्यक्रमों, भाषणों और नारों की गूंज सुनाई देती है। सरकारी अवकाश, श्रमिक संगठनों की सक्रियता और अधिकारों की चर्चा के बीच एक सवाल लगातार उभरता है कि क्या यह तिथि वास्तव में भारतीय मजदूरों के इतिहास और उनकी चेतना का प्रतिनिधित्व करती है। इस प्रश्न को ‘भारतीय मजदूर संघ’ ने लंबे समय से उठाया है और इसके पीछे के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और वैचारिक पक्षों को सामने रखने का प्रयास किया है।
 
 
मई दिवस के इतिहास को देखने पर यह स्पष्ट होता है कि इसका मूल स्वरूप श्रमिक आंदोलनों से नहीं जुड़ा था। प्राचीन ग्रीक और रोमन समाज में यह वसंतोत्सव के रूप में मनाया जाता था। फूलों की देवी क्लोरिस के सम्मान में आयोजित इस उत्सव में आनंद, नृत्य और सामाजिक मेलजोल प्रमुख थे। समय के साथ यह परंपरा यूरोप के विभिन्न हिस्सों में फैली। कुछ स्थानों पर इसकी मर्यादा भंग होने लगी, जिसके कारण ब्रिटेन में सत्रहवीं सदी के दौरान इसे प्रतिबंधित करना पड़ा, जबकि फ्रांस में इसे धार्मिक स्वरूप देकर मरियम के सम्मान में मनाया जाने लगा। इस प्रकार प्रारंभिक रूप में मई दिवस का श्रमिक वर्ग से कोई प्रत्यक्ष संबंध दिखाई नहीं देता।
 
 
आठ घंटे काम की मांग का असली संदर्भ
 
 
औद्योगिक क्रांति के दौर में जब मजदूरों की स्थिति अत्यंत कठिन हो गई, तब आठ घंटे कार्यदिवस की मांग उठी। आम धारणा यह है कि यह संघर्ष 1886 के शिकागो आंदोलन से जुड़ा है, परंतु ऐतिहासिक तथ्यों की गहराई में जाने पर एक अलग तस्वीर सामने आती है। भारत में 1862 में हावड़ा रेलवे स्टेशन के मजदूरों ने आठ घंटे काम की मांग को लेकर आंदोलन किया था, जोकि शिकागो की घटनाओं से कई वर्ष पहले का है।
 
 
इस दिन को लेकर भारतीय मजदूर संघ के राष्‍ट्रीय उपाध्यक्ष पवन कुमार कहते हैं, “एक मई को श्रमिक दिवस मानने की परंपरा भारत की अपनी ऐतिहासिक प्रक्रिया से नहीं निकली है। यह एक आयातित अवधारणा है, जिसे बिना गहराई से समझे स्वीकार कर लिया गया। भारत में श्रमिक चेतना और संघर्ष की परंपरा इससे कहीं अधिक पुरानी और स्वाभाविक रही है।” उनका मानना है कि भारत में श्रम का सम्मान सांस्कृतिक रूप से जुड़ा हुआ है, जबकि एक मई का स्वरूप बाहरी प्रभावों से निर्मित हुआ है।
 
 
भारतीय परंपरा और विश्वकर्मा की अवधारणा
 
 
वे बताते हैं, “भारत में एक मई को श्रमिक दिवस के रूप में अपनाने की प्रक्रिया बीसवीं सदी के तीसरे दशक में शुरू हुई। इसके बावजूद भारत की अपनी श्रम परंपरा कहीं अधिक व्यापक रही है। यहां श्रम को पूजा के रूप में देखा गया है और भगवान विश्वकर्मा को सृजन और श्रम का प्रतीक माना गया है।”
 
 
पवन कुमार कहते हैं, “विश्वकर्मा जयंती हमारे यहां श्रम के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है। यह हमारी संस्कृति से जुड़ी हुई परंपरा है।मजदूरों का सम्मान हर दिन होना चाहिए।” साथ ही इनका कहना यह रहा कि “समय आ गया है कि हम अपने इतिहास के आधार पर मजदूर दिवस की नई परिभाषा तय करें।”
 
 
इस संदर्भ में मध्य प्रदेश में भारतीय मजदूर संघ के प्रदेश महामंत्री कुलदीप सिंह गुर्जर कहते हैं, “यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि भारत के मजदूरों ने अपने अधिकारों के लिए बहुत पहले आवाज उठाई थी। फिर भी हम अपने ही इतिहास को भूलकर एक विदेशी घटना को प्रतीक बना लेते हैं, यह विचारणीय है।” उल्‍लेखनीय है कि अमेरिका में भी 1866 में नेशनल लेबर यूनियन ने इस मांग को प्रमुख रूप से रखा और 1868 में इसे लागू किया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह प्रक्रिया क्रमिक थी, न कि किसी एक घटना का परिणाम।
 
 
शिकागो की घटनाएँ और वास्तविकता
 
 
शिकागो की घटनाओं का उल्लेख अक्सर एक मई से जोड़ा जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि प्रमुख घटनाएं तीन और चार मई को हुई थीं। मक्कोर्मिक फैक्टरी के बाहर हुई झड़प और हे मार्केट स्क्वायर में हुआ बम विस्फोट इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में रहे। इस हिंसा में मजदूरों और पुलिस दोनों को नुकसान हुआ और कई श्रमिक नेताओं को कठोर दंड दिया गया। इस पर टिप्पणी करते हुए कुलदीप सिंह गुर्जर कहते हैं, “शिकागो की घटनाओं को जिस रूप में प्रस्तुत किया जाता है, वह अधूरा है। यह आंदोलन मजदूरों की जीत का नहीं, बल्कि हिंसा के कारण कमजोर पड़ने का उदाहरण भी है।”
 
 
उन्नीसवीं सदी के अंत में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर श्रमिक आंदोलनों में वैचारिक हस्तक्षेप बढ़ने लगा। 1889 में पेरिस में एक मई को अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस घोषित किया गया। इसके बाद इस दिन का उपयोग विभिन्न राजनीतिक उद्देश्यों के लिए होने लगा। कुलदीप सिंह गुर्जर कहते हैं, “एक मई का स्वरूप धीरे-धीरे वैचारिक मंच बन गया। इसमें श्रमिकों के वास्तविक मुद्दों के साथ अन्य एजेंडे भी जुड़ गए।” वर्ग संघर्ष, साम्राज्यवाद विरोध और अन्य नारे इसके साथ जुड़े और मूल उद्देश्य पीछे छूटता गया।
 
 
क्यों कई देशों ने बदला रास्ता
 
 
अमेरिका और कनाडा ने श्रमिक दिवस के लिए सितंबर का पहला सोमवार चुना। इसका उद्देश्य श्रमिकों के सम्मान को किसी विशेष विचारधारा से अलग रखना था। यह निर्णय इस बात का संकेत देता है कि मई दिवस का स्वरूप सर्वमान्य नहीं रहा। आज कई देशों ने इस बदलाव के माध्यम से यह संदेश दिया कि श्रमिक सम्मान को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रखना आवश्यक है।
 
 
कुलदीप सिंह गुर्जर इस विचार को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, “भारतीय मजदूर संघ लंबे समय से यह मांग करता आया है कि विश्वकर्मा जयंती को राष्ट्रीय श्रमिक दिवस के रूप में मान्यता दी जाए। यह हमारी जड़ों से जुड़ा हुआ विकल्प है।” एक तरह से मई दिवस के इतिहास को समग्र रूप से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि इसका स्वरूप समय के साथ कई बार बदला है। कभी यह उत्सव रहा, कभी संघर्ष का प्रतीक बना और बाद में वैचारिक माध्यम बन गया।
 
 
आज आवश्यकता इस बात की है कि श्रमिकों के अधिकारों और सम्मान को किसी एक दिन तक सीमित न रखा जाए। सुरक्षित कार्यस्थल, उचित वेतन और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में कहना यही होगा कि एक मई को लेकर बहस एक तिथि का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह उस दृष्टिकोण का भी प्रश्न है जिसके आधार पर श्रमिकों के योगदान को समझा जाता है। भारतीय मजदूर संघ का मत इस दिशा में एक वैकल्पिक सोच प्रस्तुत करता है, जोकि इतिहास, संस्कृति और वर्तमान आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करने की बात करती है।