गिरीश जोशी
संस्कृति अध्येता एवं स्तंभकार
सामान्य तौर पर ये आम धारणा है कि कृष्ण ने युद्ध और शांति की बात बुद्ध ने की है । दोनों के जन्म के समय घटी घटनाओं को देखें तो ये ध्यान में आता है कि बुद्ध यानि बालक सिद्धार्थ गौतम वैराग्य के मार्ग पर ना चले जाए इसके लिए उनके पिता ने उनका लालन-पालन राजसी ठाट - बाट के साथ पूरी सुख - सुविधाओं और वैभव में किया। वहीं कृष्ण को जन्म के पहले से ही जानलेवा खतरों का सामना करना पड़ा। कृष्ण के जन्म से पूर्व ही उनकी हत्या करने का षड्यंत्र कंस मामा ने रचना शुरू कर दिया था। जन्म लेते ही उनकी जान बचाने के लिए पिता को उफ़नती यमुना नदी में उन्हें अपनी जन्मदात्री माँ से दूर ले जाना पड़ा। जन्मभूमि से दूर नंद और यशोदा के यहां उनका लालन - पालन हुआ। फिर पूतना, चाणूर मुष्टिक जैसे न जाने कितने असुर उनकी जान लेने के लिए हमले करने लगे, यहाँ तक की अपनी जन्मभूमि छोड़कर भी उन्हें द्वारका जाना पड़ा।
युवराज सिद्धार्थ गौतम ने सबसे पहले एक मृत शरीर को देखा फिर लाचार वृद्ध , रोगी को देखा तब उनके मन में दु:खों के कारण को जानने की जिज्ञासा जागी, इसने उनके मन में वैराग्य का भाव उत्पन्न कर दिया और वे सारा वैभव, सुख - सुविधा , राजपाट को छोडकर सत्य की खोज में निकल पड़े। अपनी साधना में लीन रहते हुए उन्होंने बुद्ध पूर्णिमा के दिन ही सृष्टि के सत्य को जानकर बुद्धत्व को प्राप्त किया।
ये गौरतलब है कि जो सुख और सुविधाओं में पला-बढा वह दु:ख के कारणो को जानने सत्य की खोज करने के लिए निकला और जो दु:ख, अन्याय - अत्याचार से होकर गुजरा वो जीवन में आनंद के साथ सत्य को पाने की राह बताता रहा।
वास्तव में अपनी दुनिया विरोधाभासों का ही कुल जमा योग है, जो विरोधाभासों को पूर्ण रूप से स्वीकार करता है वही दुनिया को समग्रता से समझ भी सकता है। सृष्टि दो विरोधाभासों का संतुलन है। जैसे सृष्टि में दिन-रात, ठंड- गर्मी, प्रकाश - अंधेरा होता है वैसे ही दु:ख और सुख भी इसी सृष्टि के दो अलग-अलग छोर हैं, दोनों को अलग नहीं किया जा सकता। यदि अलग करके देखेंगे तो पूरी सृष्टि और इसका रहस्य समझ में नहीं आ सकता। चूंकि समग्रता से सृष्टि को जानना हमारी बुद्धि के लिए संभव नहीं होता इसलिए किसी एक छोर को पकड़ कर आगे बढ़ना पड़ता है। बुद्ध, दु:ख – वेदना के छोर को तो कृष्ण सुख- आनंद के छोर को पकड़ कर आगे बढ़े।
भगवान बुद्ध के अनुसार हमारे दु:ख का कारण जाने अनजाने में हर घटना, विचार, बात यहाँ तक की अपने भीतर उठ रही संवेदना के प्रति प्रतिक्रिया व्यक्त करना है। जो हमारे अनुकूल होता है हम उस पर मन के भीतर या बाहर सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हैं और जो हमें अपने हिसाब से प्रतिकूल लगता है उसे पर हम नकारात्मक प्रतिक्रिया देते हैं । ये दोनों ऊर्जा के रूप में हमारे भीतर जमा हो जाते हैं। बुद्ध ने दीघनिकाय के ब्रह्मजाल सूत्र में कहा - ”वेदानां समुदायं च अथंगमं च असदं च आदिनवं च निस्सारणं च यथाभूतं विदित्वा अनुपादविमुत्तो, भिक्खवे, तथागतो।। “ यानि जब भी हम पांच इंद्रियों या छठी इंद्रिय (मन) के माध्यम से किसी वस्तु का अनुभव करते हैं, तो एक संवेदना उत्पन्न होती है और उस संवेदना के आधार पर, तृष्णा (लालसा और घृणा) उत्पन्न होती है। यदि संवेदना सुखद है, तो हम उसे लंबे समय तक बनाए रखने की लालसा रखते हैं, यदि वो अप्रिय है, तो हम उससे छुटकारा पाने की चाह रखते हैं। यही बंधन का या कहे दु:ख का कारण बनता है। आगे बुद्ध कहते हैं – “जब हम सुखद या दुखद संवेदनाओं के उत्पन्न होने और समाप्त होने, उनका आनंद लेने, उनके उत्पन्न और लुप्त होने को पूरी तरह से समझ लेते हैं, तो वे पूर्णतः मुक्त हो जाते हैं।“
इसी बात को भगवान श्री कृष्ण ने गीता के अध्याय 2 श्लोक 14 में कहा - “ मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ||” यानि हे कुन्तीपुत्र! सर्दी और गरमी, सुख और दुःख के विचार इन्द्रियों से सम्बन्धित विषयों के सम्पर्क से उत्पन्न होते हैं। ऐसे विचार आदि और अन्त से सीमित हैं, ये अनित्य हैं। हे भारत; इन्हें धैर्य के साथ सहन करो, जब कोई मनुष्य दुःखों के प्रति एक सहज अवस्था, अस्थायी सुख के प्रति एक अनासक्त अवस्था, भय एवं क्रोध तथा कष्ट उत्पन्न करने वाले उत्तेजकों के प्रति निस्पृहता को अपनाता है तो उसका मन सन्तुलन की स्थिर अवस्था प्राप्त कर लेता है। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए अध्याय 2 श्लोक 25 में भगवान कहते है – “ अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते |
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ||” अन्तर्ज्ञान आत्मा तथा अहं के विचारों और संवेदनों के बीच का पुल है। यदि कोई व्यक्ति पर्याप्त लम्बी अवधि तक विचारों और संवेदनों से एकरूप हुए बिना रह सके तो वह अन्तर्ज्ञान के विकास द्वारा आत्मा की प्रकृति को जान लेगा। इस प्रकार जब व्यक्ति पूरी तरह शान्त होता है, तो उसे अपने मूल अस्तित्व का बोध होता है।
भगवान बुद्ध कहते हैं - "अयं खो पण कायो अनिक्को संखतो पटिकसमुप्पन्नो। अनिचं खो पण संखतं पत्तिकसमुप्पन्नं कायं पत्तिक्का उप्पन्ना सुखा वेदना कुतो निच्चसमुप्पन्नो।" यानि यह शरीर क्षणभंगुर , बद्ध और आश्रित है। तो फिर इसमें उठने वाली कोई एक सुखद या दुखद अनुभूति स्थायी कैसे हो सकती है, जबकि यह एक ऐसे शरीर पर निर्भर होकर उत्पन्न हुई है जो खुद क्षणभंगुर और आश्रित है? इन्द्रियों का उनके विशेष विषयों के प्रति राग एवं द्वेष, प्रकृति द्वारा नियत है। इस द्वन्द्व के प्रभाव से सावधान रहना चाहिए, वास्तव में, ये दोनो (मनोवैज्ञानिक गुण) व्यक्ति के शत्रु हैं!
सुख व दु:ख से ऊपर उठना ही हर मानव का मूल लक्ष्य होता है । ऐसे व्यक्ति को गीता में “स्थितप्रज्ञ” और भगवान गौतम बुद्ध ने “अरिहंत “कहा है ।
गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक 54 में अर्जुन भगवान श्री कृष्ण से पुछते है “ स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव । स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥“ अर्थात हे केशव! स्थितप्रज्ञ यानि समाधि में स्थित स्थिर बुद्धि पुरुष के क्या लक्षण हैं? वह (स्थितप्रज्ञ) क्या बोलता है? कैसे बैठता है? और कैसे चलता (व्यवहार करता) है?
भगवान श्लोक 55-56 में उत्तर देते है “ प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् । आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥ दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥“
हे पार्थ! जिस समय व्यक्ति अपने मन में उठने वाली सारी कामनाओं (अच्छी – बुरी ) को पूरी तरह त्याग देता है और आत्म भाव में संतुष्ट रहता है, वह 'स्थितप्रज्ञ' हो जाता है। "
बौद्ध ग्रंथ संयुत्त निकाय 22.76 में अरिहंत के लक्षण बताए गए हैं: "छिन्नपपंचो" यानि जो मानसिक द्वंद्व/कल्पनाओं से मुक्त है, "परिळाहो न विज्जति" यानि जिसे कोई मानसिक संताप नहीं है । "मूलासयस्स समुग्घातो" अर्थात जो दु:खों की मूल जड़ का विनाश कर चूका है । "अवितराग" जो राग (आसक्ति), द्वेष (घृणा) और मोह से ऊपर उठ चुका है ।
कहा जाता है कि हिंदू धर्म का सार वेदों में हैं, वेदों का सार उपनिषदों में है, उपनिषदों का सार गीता में है और गीता का सार ‘स्थितप्रज्ञता’ की व्याख्या में है। और स्थितप्रज्ञ के सारे गुण भगवान बुद्ध ने अरहंत में बताये हैं।
वस्तुतः जो स्थितप्रज्ञ है वही अरिहंत है और अरिहंत ही स्थितप्रज्ञ है।
इस बात से यह ध्यान में आता है कि बुद्ध ने सम्यक मार्ग से दस परिमिताओं का पालन करते हुए विपश्यना की साधना से अरिहंत बनने का लक्ष्य सबके सामने रखा। भगवान श्री कृष्ण ने भक्ति योग, कर्म योग , ज्ञान योग और ध्यान योग के माध्यम से स्थितिप्रज्ञ अवस्था को प्राप्त करने का लक्ष्य रखा। अरिहंत सभी दु:खों से मुक्त होकर आनंद को प्राप्त करता है, स्थितप्रज्ञ आनंद को प्राप्त कर दु:खों से मुक्त होता है। इसलिए हमारे यहाँ शास्त्रों में कहा गया है - "एकम् सत् विप्रा बहुधा वदन्ति” । इसलिए कृष्ण और बुद्ध के कहने की पद्धति और परिस्थिति में अंतर है लेकिन संदेश एक ही है ।