पहचान की राजनीति का विस्तार और बदलती सामाजिक संरचना का नया दौर

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    09-Apr-2026
Total Views |

algbtq
 
दीपक कुमार द्विवेदी
शिक्षाविद्   
 
 
बीसवीं सदी में पश्चिमी समाज में एक वैचारिक परिवर्तन धीरे-धीरे विकसित हुआ, जिसने परिवार, विवाह, लिंग पहचान और सांस्कृतिक मूल्यों जैसी पारंपरिक संरचनाओं को चुनौती देना शुरू किया। यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ। इसकी बौद्धिक नींव 1920 और 1930 के दशक में ही रखी जा चुकी थी, लेकिन इसका सामाजिक प्रभाव 1960 और 1970 के दशक में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा।
 
 
3 फरवरी 1923 में जर्मनी में फ्रैंकफर्ट स्कूल की स्थापना हुई, जहाँ मैक्स होर्खाइमर, थियोडोर अडोर्नो, हर्बर्ट मार्क्यूज़ और एरिक फ्रॉम जैसे विचारकों ने पारंपरिक मार्क्सवाद को केवल आर्थिक वर्ग-संघर्ष तक सीमित न रखकर संस्कृति, समाज और मनोविज्ञान के स्तर पर समझने का प्रयास किया। इसी दौर में “क्रिटिकल थ्योरी” की अवधारणा विकसित हुई, जिसमें परिवार, धर्म, शिक्षा और सामाजिक नैतिकता जैसी संस्थाओं की आलोचनात्मक समीक्षा की गई।
 
 
इसी के समानांतर इटली के विचारक अंतोनियो ग्राम्शी ने “सांस्कृतिक वर्चस्व” (Cultural Hegemony) का सिद्धांत दिया। ग्राम्शी का मानना था कि सत्ता केवल आर्थिक नियंत्रण से नहीं चलती, बल्कि शिक्षा, संस्कृति, मीडिया और परिवार जैसी संस्थाओं के माध्यम से समाज की सोच को प्रभावित किया जाता है। यदि इन संस्थाओं को प्रभावित किया जाए, तो समाज की संरचना धीरे-धीरे बदली जा सकती है।
 
 
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद फ्रैंकफर्ट स्कूल के कई विचारक अमेरिका चले गए और उनके विचार अमेरिकी विश्वविद्यालयों में फैलने लगे। 1960 के दशक में यही विचार सामाजिक आंदोलनों के रूप में सामने आए। अमेरिका और यूरोप में “यौन क्रांति”, दूसरा नारीवादी आंदोलन और छात्र आंदोलन शुरू हुए। 1968 में फ्रांस, अमेरिका और जर्मनी में बड़े छात्र आंदोलन हुए, जिन्होंने पारंपरिक परिवार व्यवस्था, विवाह संस्था और धार्मिक नैतिकता को चुनौती दी।
 
 
इसी दौर में पहचान आधारित राजनीति (Identity Politics) का उदय हुआ। आर्थिक वर्ग-संघर्ष—पूंजीपति बनाम श्रमिक—की जगह नस्ल, लिंग, लैंगिक पहचान और सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दे राजनीतिक विमर्श में आने लगे। विवाह संस्था, पारंपरिक लिंग भूमिकाएँ और धार्मिक मूल्यों पर सवाल उठने लगे।
 
 
यहीं से सामाजिक और सांस्कृतिक संघर्ष की राजनीति ने आकार लेना शुरू किया, जिसने आगे चलकर जेंडर सिद्धांत, पहचान की राजनीति और LGBTQ विमर्श को वैचारिक आधार प्रदान किया।
 
 
इसके बाद 1990 में अमेरिकी विचारक जूडिथ बटलर की पुस्तक जेंडर ट्रबल प्रकाशित हुई। इस पुस्तक ने जेंडर को जैविक नहीं बल्कि सामाजिक निर्माण बताया। बटलर ने यह तर्क दिया कि पुरुष और महिला की पहचान स्थायी नहीं है, बल्कि सामाजिक भूमिकाओं और सांस्कृतिक संरचनाओं से निर्मित होती है। यह विचार तेजी से अकादमिक जगत में फैल गया।
 
 
1990 के दशक में अमेरिका और यूरोप के विश्वविद्यालयों में जेंडर स्टडीज़, क्वीर थ्योरी और पहचान आधारित राजनीति के पाठ्यक्रम शुरू हुए। इस दौर में पहचान आधारित संघर्ष जाति, नस्ल, लिंग, लैंगिक पहचान को राजनीतिक विमर्श में प्रमुख स्थान मिलने लगा। पारंपरिक मार्क्सवाद का आर्थिक वर्ग संघर्ष धीरे-धीरे पहचान संघर्ष में परिवर्तित होने लगा।
 
 
यहीं से LGBTQ विमर्श को बौद्धिक आधार मिला और आगे चलकर यह विश्वविद्यालयों से निकलकर मीडिया, मनोरंजन उद्योग और नीति निर्माण तक पहुँचने लगा।
 
 
इक्कीसवीं सदी की शुरुआत के साथ इंटरनेट और सोशल मीडिया ने केवल संचार की दुनिया नहीं बदली, बल्कि विचारधाराओं के प्रसार की गति भी अभूतपूर्व रूप से तेज कर दी। 2000 के बाद पहचान आधारित राजनीति, जेंडर सिद्धांत और LGBTQ विमर्श धीरे-धीरे अकादमिक दायरे से निकलकर सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करने लगा। इस प्रक्रिया में 2007 का वर्ष महत्वपूर्ण माना जाता है, जब इंडोनेशिया के योग्याकार्ता शहर में अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विशेषज्ञों की बैठक के बाद योग्याकार्ता सिद्धांत जारी किए गए। इन सिद्धांतों में पहली बार यौन पहचान और जेंडर पहचान को मानवाधिकार के रूप में व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत किया गया। इसके बाद यह मुद्दा केवल सामाजिक चर्चा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संगठनों, विश्वविद्यालयों और नीति निर्माण की बहसों में शामिल होने लगा।
 
 
2010 के बाद यह विमर्श और तेज़ हुआ। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इस बदलाव के सबसे बड़े माध्यम बने। 2014 में फेसबुक ने अपने उपयोगकर्ताओं को 56 जेंडर विकल्प चुनने का विकल्प दिया। यह एक तकनीकी निर्णय मात्र नहीं था, बल्कि पहचान आधारित विचार को डिजिटल स्तर पर वैधता देने का कदम था। बाद में यह संख्या बढ़ती गई और कई विश्वविद्यालयों तथा एक्टिविस्ट समूहों ने 70, 100 और कुछ जगह 126 तक जेंडर पहचान सूचीबद्ध करनी शुरू कर दी। इसी दौरान LGBTQ शब्द भी विस्तारित होता गया—LGBT से LGBTQ, फिर LGBTQIA+, और आगे LGBTQIKJ जैसे नए रूप सामने आए। इससे यह संकेत मिला कि लिंग पहचान को स्थायी जैविक आधार से हटाकर बदलने योग्य सामाजिक पहचान के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
 
 
इसी समय सतरंगी झंडा इस आंदोलन का वैश्विक प्रतीक बन गया। प्राइड परेड पहले अमेरिका और यूरोप तक सीमित थे, लेकिन 2010 के बाद यह एशिया और भारत तक फैलने लगे। भारत में 2008 में दिल्ली और मुंबई में शुरुआती प्राइड मार्च आयोजित हुए। 2012 के बाद बेंगलुरु, कोलकाता और चेन्नई में भी ऐसे आयोजन होने लगे। 2015 के बाद ये कार्यक्रम नियमित हो गए और सोशल मीडिया ने इन्हें व्यापक दृश्यता दी। इन आयोजनों में केवल अधिकारों की मांग ही नहीं, बल्कि नई जेंडर पहचान अवधारणाओं को सामान्य बनाने का प्रयास भी दिखाई देने लगा।
 
 
भारत में इस विषय को मुख्यधारा में लाने का एक महत्वपूर्ण मोड़ वर्ष 2013 में आया, जब सत्यमेव जयते कार्यक्रम में आमिर खान ने LGBTQ समुदाय से जुड़े लोगों को मंच दिया। राष्ट्रीय स्तर पर प्रसारित इस कार्यक्रम के बाद पहली बार इस विषय पर व्यापक सामाजिक चर्चा शुरू हुई। इसके बाद मीडिया में लेख, बहस और टीवी कार्यक्रम बढ़ने लगे। विश्वविद्यालयों में जेंडर स्टडीज़ और क्वीर थ्योरी पर सेमिनार आयोजित होने लगे और धीरे-धीरे इससे संबंधित पाठ्यक्रम भी शुरू किए जाने लगे।
 
 
कानूनी स्तर पर यह प्रक्रिया 2001 में शुरू हुई, जब नाज़ फाउंडेशन ने दिल्ली हाई कोर्ट में धारा 377 को चुनौती दी। 2009 में दिल्ली हाई कोर्ट ने धारा 377 को आंशिक रूप से निरस्त कर दिया। 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया और धारा 377 को पुनः लागू कर दिया। इसके बाद कई एक्टिविस्ट समूह, शिक्षाविद और सार्वजनिक हस्तियाँ इस मुद्दे पर सक्रिय हो गए। अंततः 2018 में नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 के उस हिस्से को निरस्त कर दिया, जो सहमति से बने वयस्क संबंधों को अपराध मानता था। यह केवल न्यायिक फैसला नहीं था, बल्कि वर्षों तक चले सामाजिक, मीडिया और अकादमिक विमर्श का परिणाम था।
 
 
इसके बाद 2019 में केंद्र सरकार ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम पारित किया। 2020 में इसके नियम बनाए गए और 2026 में इसमें संशोधन की प्रक्रिया शुरू हुई। इससे स्पष्ट हुआ कि यह विषय अब केवल सामाजिक चर्चा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि धीरे-धीरे नीति-निर्माण का भी हिस्सा बन चुका है।
 
 
6 अप्रैल 2026 को तृणमूल कांग्रेस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ ली। यह केवल एक सामान्य संसदीय घटना नहीं रही, बल्कि इसे तुरंत वैचारिक और प्रतीकात्मक महत्व देकर प्रस्तुत किया गया। मेनका गुरुस्वामी लंबे समय से LGBTQ अधिकारों से जुड़े अभियानों में सक्रिय रही हैं और 2018 में नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ मामले में धारा 377 को निरस्त कराने वाली कानूनी टीम का हिस्सा रही थीं। उन्हें लंबे समय से वामपंथी विचारधारा से जुड़े एक्टिविस्ट समूहों के साथ सक्रिय रूप से काम करने वाले चेहरों में गिना जाता रहा है।
 
 
शपथ ग्रहण के तुरंत बाद राष्ट्रीय मीडिया में इसे “भारत में LGBTQ प्रतिनिधित्व का नया अध्याय” और “ऐतिहासिक क्षण” बताकर व्यापक रूप से प्रस्तुत किया गया। दैनिक भास्कर, अमर उजाला, नवभारत टाइम्स, एबीपी न्यूज़ सहित कई प्रमुख मीडिया संस्थानों ने इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया। यह केवल एक सांसद की शपथ की खबर नहीं रही, बल्कि इसे एक वैचारिक उपलब्धि के रूप में स्थापित किया गया। यही वह प्रक्रिया है जिसे वैचारिक ब्रांडिंग कहा जाता है, जहाँ किसी व्यक्ति को एक बड़े आंदोलन का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया जाता है।
 
 
यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है। भारत में LGBTQ समुदाय की संख्या विभिन्न अनुमानों के अनुसार लगभग 6 लाख बताई जाती है। इसके विपरीत भारत में विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदाय—DNT-NT-SNT—की संख्या लगभग 11 करोड़ से अधिक मानी जाती है। इन समुदायों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति अत्यंत पिछड़ी हुई है। लेकिन राष्ट्रीय मीडिया और बौद्धिक विमर्श में इनके मुद्दे शायद ही कभी प्रमुखता पाते हैं।
 
 
इस तुलना से यह स्पष्ट दिखाई देता है कि विमर्श का केंद्र केवल जनसंख्या या सामाजिक आवश्यकता नहीं, बल्कि वैचारिक प्राथमिकता बन चुकी है। यही वह बिंदु है जहाँ पहचान आधारित राजनीति और वामपंथी सांस्कृतिक विमर्श की भूमिका दिखाई देती है।
 
 
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनोरंजन उद्योग ने इस विमर्श को भारत से काफी पहले आगे बढ़ाना शुरू कर दिया था। 1990 के दशक से ही हॉलीवुड फिल्मों और पश्चिमी टीवी श्रृंखलाओं में LGBTQ पात्रों को शामिल किया जाने लगा था। 2000 के बाद यह प्रवृत्ति और तेज़ हुई। 2010 के बाद नेटफ्लिक्स, डिज़्नी और अन्य वैश्विक मनोरंजन कंपनियों ने अपनी सामग्री में LGBTQ पात्रों को योजनाबद्ध तरीके से बढ़ाना शुरू किया। कई लोकप्रिय श्रृंखलाओं और फिल्मों में इन पात्रों को मुख्य भूमिका में प्रस्तुत किया गया, जिससे यह विषय धीरे-धीरे सामान्य सामाजिक व्यवहार के रूप में स्थापित होने लगा।
 
 
भारत में यह प्रक्रिया अपेक्षाकृत देर से शुरू हुई। 2018 के बाद OTT प्लेटफॉर्म के विस्तार के साथ इस प्रकार के कंटेंट में तेजी आई। नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम, डिज़्नी+ हॉटस्टार और अन्य प्लेटफॉर्म पर वेब सीरीज़ और फिल्मों में LGBTQ विषयों को प्रमुखता मिलने लगी। पहले जहाँ यह विषय सीमित फिल्मों या समानांतर सिनेमा तक सीमित था, वहीं डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इसे मुख्यधारा तक पहुँचा दिया।
 
इस प्रकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शुरू हुआ यह सांस्कृतिक प्रवाह धीरे-धीरे भारत तक पहुँचा और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से तेजी से फैलने लगा।
 
 
सोशल मीडिया ने इस प्रक्रिया को और तेज़ कर दिया। सतरंगी झंडे के साथ प्राइड मार्च, डिजिटल अभियान और विश्वविद्यालयों में जेंडर पहचान से जुड़े कार्यक्रम बढ़ने लगे। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता जैसे शहरों में आयोजित प्राइड मार्च को मीडिया ने व्यापक कवरेज दी।
 
 
इस पूरी प्रक्रिया को क्रम में देखें तो एक स्पष्ट ढाँचा दिखाई देता है पहले विश्वविद्यालयों में वैचारिक आधार तैयार होता है,फिर वामपंथी एक्टिविस्ट समूह इसे सामाजिक अभियान बनाते हैं,मीडिया और मनोरंजन उद्योग इसे सामान्य बनाते हैं,सोशल मीडिया इसे व्यापक रूप से फैलाता है,और अंततः राजनीतिक प्रतिनिधित्व के माध्यम से इसे संस्थागत वैधता मिलती है।
 
 
मेनका गुरुस्वामी का राज्यसभा पहुँचना इसी प्रक्रिया की एक कड़ी के रूप में देखा जा सकता है। यह केवल एक व्यक्ति का राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि एक वैचारिक विमर्श को संस्थागत स्तर पर स्थापित करने का उदाहरण भी
कॉर्पोरेट कंपनियों ने भी इस अभियान को समर्थन दिया। Nike, Google, Apple, Microsoft जैसी कंपनियाँ हर वर्ष प्राइड अभियान चलाती हैं। 2023 में 500 से अधिक वैश्विक कंपनियों ने प्राइड अभियान में भाग लिया। कंपनियाँ अपने लोगो को सतरंगी रंग में बदलती हैं, विशेष उत्पाद लॉन्च करती हैं और LGBTQ पहचान को सामान्य बनाती हैं।
 
 
इस पूरे अभियान में मेडिकल और ड्रग उद्योग का आर्थिक हित सबसे बड़ा है। जेंडर परिवर्तन केवल सर्जरी नहीं बल्कि जीवन भर चलने वाली चिकित्सा प्रक्रिया है। इसमें हार्मोन थेरेपी, सर्जरी, मानसिक परामर्श और जीवन भर दवा का उपयोग शामिल होता है।
 
 
वैश्विक स्तर पर लिंग परिवर्तन से जुड़ा चिकित्सा उद्योग तेजी से उभरता हुआ एक नया आर्थिक क्षेत्र बन चुका है। बाज़ार अनुसंधान संस्था Grand View Research की 2022 की रिपोर्ट में संकेत दिया गया कि जेंडर-अफर्मिंग हेल्थकेयर का वैश्विक बाजार लगातार विस्तार कर रहा है और आने वाले वर्षों में इसकी वृद्धि दर तेज़ रहने की संभावना है। इस क्षेत्र में हार्मोन थेरेपी, सर्जरी, मनोवैज्ञानिक परामर्श, दीर्घकालिक दवाएँ, फॉलो-अप उपचार और पुनर्निर्माण सर्जरी शामिल होती हैं, जो इसे एक बार की प्रक्रिया नहीं बल्कि दीर्घकालिक चिकित्सा निर्भरता में बदल देती हैं।
 
 
यदि विश्व की लगभग 8 अरब आबादी में से केवल 50 करोड़ लोग भी अपने जीवन में एक बार लिंग परिवर्तन या संबंधित चिकित्सा प्रक्रिया अपनाते हैं, और प्रति व्यक्ति औसतन 5 लाख रुपये का व्यय मान लिया जाए, तो कुल संभावित बाजार लगभग 2500 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच सकता है। यह आंकड़ा केवल अनुमानात्मक है, लेकिन इससे इस क्षेत्र की संभावित आर्थिक विशालता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
 
 
ध्यान देने वाली बात यह है कि यह खर्च केवल एक बार का नहीं होता। हार्मोन थेरेपी कई मामलों में जीवनभर चलती है, नियमित चिकित्सकीय जांच आवश्यक होती है, और कई बार पुनः सर्जरी की आवश्यकता पड़ती है। इसका अर्थ है कि यह चिकित्सा क्षेत्र स्थायी उपभोक्ता-आधारित मॉडल में बदल जाता है। यही कारण है कि वैश्विक फार्मा कंपनियाँ, निजी अस्पताल समूह, और चिकित्सा उपकरण निर्माता इस क्षेत्र में निवेश बढ़ा रहे हैं।
 
 
इस पूरे विमर्श में टेक उद्योग और प्रभावशाली व्यक्तियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रूप से सामने आई है। विशेष रूप से एलन मस्क ने 2023 में सार्वजनिक रूप से जेंडर पहचान से जुड़े मुद्दों पर गंभीर चिंता व्यक्त की। एलन मस्क ने कहा कि बच्चों और किशोरों पर जेंडर पहचान बदलने के लिए सामाजिक और संस्थागत दबाव खतरनाक हो सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि उनके अपने परिवार में जेंडर पहचान को लेकर विवाद हुआ, जिसके बाद उन्होंने इस विषय पर खुलकर अपनी बात रखी। एलन मस्क ने सोशल मीडिया मंच एक्स (पूर्व ट्विटर) पर कई बार लिखा कि नाबालिगों को स्थायी शारीरिक परिवर्तन की ओर धकेलना दीर्घकालिक मानसिक और शारीरिक जोखिम पैदा कर सकता है।
 
 
एलन मस्क का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि टेक उद्योग लंबे समय तक LGBTQ अभियानों के प्रमुख समर्थकों में शामिल रहा है। ऐसे में दुनिया के सबसे प्रभावशाली टेक उद्यमियों में से एक द्वारा इस पर चिंता व्यक्त करना यह दर्शाता है कि यह विषय अब केवल सामाजिक अधिकारों का मुद्दा नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक बहस का विषय बन चुका है।
 
 
इसी तरह इस मुद्दे पर वैश्विक राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आई। 2024 के अमेरिकी चुनाव अभियान के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट कहा कि केवल दो जैविक लिंग — पुरुष और महिला — को ही मान्यता दी जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि स्कूलों में जेंडर पहचान आधारित शिक्षा की समीक्षा की जाएगी और बच्चों को जेंडर परिवर्तन की ओर प्रेरित करने वाली नीतियों पर रोक लगाई जाएगी। डोनाल्ड ट्रंप का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे यह स्पष्ट हुआ कि यह मुद्दा अब सामाजिक बहस से आगे बढ़कर वैश्विक राजनीतिक संघर्ष का विषय बन चुका है।
 
 
इस पूरे परिदृश्य में अंतरराष्ट्रीय एनजीओ नेटवर्क की भूमिका भी महत्वपूर्ण रूप से सामने आती है। ओपन सोसाइटी फाउंडेशंस और फोर्ड फाउंडेशन जैसे संगठनों ने वर्षों से जेंडर पहचान और LGBTQ से जुड़े कार्यक्रमों को वित्तीय सहायता प्रदान की है। यह फंडिंग सीधे राजनीतिक दलों को नहीं दी जाती, बल्कि शोध संस्थानों, विश्वविद्यालयों, मीडिया अभियानों, सामाजिक संगठनों और कानूनी याचिकाओं के माध्यम से दी जाती है।
 
 
यह प्रक्रिया आमतौर पर इस प्रकार काम करती है—पहले विश्वविद्यालयों में शोध और वैचारिक ढांचा तैयार किया जाता है, फिर एनजीओ सामाजिक अभियान चलाते हैं, मीडिया इस मुद्दे को प्रमुखता देता है, और धीरे-धीरे यह सार्वजनिक नीति और कानून निर्माण तक पहुँच जाता है।
 
 
इस प्रकार टेक उद्योग, वैश्विक राजनीति और अंतरराष्ट्रीय एनजीओ नेटवर्कतीनों मिलकर इस विषय को वैश्विक और राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते दिखाई देते हैं।
 
 
यह पूरा ढाँचा स्पष्ट दिखाई देता है
विश्वविद्यालयों में विचार तैयार होते हैं
वामपंथी एक्टिविस्ट आंदोलन बनाते हैं
एनजीओ फंडिंग देते हैं
मीडिया ब्रांडिंग करता है
कॉर्पोरेट कंपनियाँ समर्थन देती हैं
सरकारी नीतियाँ प्रभावित होती हैं
मेडिकल उद्योग आर्थिक लाभ उठाता है
 
 
इस पूरी प्रक्रिया का प्रभाव परिवार व्यवस्था पर पड़ता है। विवाह और परिवार की अवधारणा कमजोर होती है। लिंग पहचान अस्थिर होती है। समाज की मूल संरचना बदलने लगती है। यही कारण है कि यह विषय केवल सामाजिक अधिकारों का नहीं बल्कि व्यापक सांस्कृतिक और आर्थिक परिवर्तन का संकेत बन चुका है।