बाबूलाल बंजारा
समाजसेवी
विश्व बंजारा दिवस प्रतिवर्ष 8 अप्रैल को मनाया जाता है। यह दिन बंजारा समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ उनके आध्यात्मिक मार्गदर्शकों जैसे संत सेवालाल जी महाराज, रूपसिंह जी महराज और लखीशाह जी महराज की स्मृतियों को समर्पित है। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि उस परंपरा, चेतना और सामाजिक जागरण का प्रतीक है जिसे इन संतों ने अपने जीवन और कार्यों के माध्यम से स्थापित किया।
8 अप्रैल को इस दिवस के रूप में मनाने के पीछे प्रमुख कारण यही है कि बंजारा समाज इन संतों को अपना आराध्य और मार्गदर्शक मानता है। इस दिन उनके द्वारा समाज सुधार के लिए किए गए कार्यों को स्मरण किया जाता है। कई स्थानों पर इसे उनके जन्मोत्सव के रूप में या उनके सिद्धांतों के प्रचार-प्रसार के लिए विशेष उत्सव की तरह भी मनाया जाता है, जिससे उनकी शिक्षाएँ समाज के व्यापक वर्ग तक पहुँच सकें।
विश्व बंजारा दिवस के पीछे कई महत्वपूर्ण उद्देश्य निहित हैं। बंजारा समुदाय की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान जैसे उनकी गोरमाटी भाषा, रंग-बिरंगी वेशभूषा, लाम्बाड़ी जैसे लोकनृत्य और पारंपरिक संगीत जिनको संरक्षित करना इस दिन का एक प्रमुख लक्ष्य है। यह दिन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने और उन्हें अपनी विरासत के प्रति जागरूक बनाने का अवसर भी प्रदान करता है। साथ ही, देश और दुनिया में फैले बंजारा समाज को एक मंच पर लाकर सामाजिक एकता को सुदृढ़ करना भी इसका महत्वपूर्ण पक्ष है।
इसके अतिरिक्त, यह दिवस समाज के शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास पर विचार-विमर्श का माध्यम बनता है। सरकारी योजनाओं और संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाकर समाज के समग्र उत्थान का प्रयास किया जाता है। विशेष रूप से संत सेवालाल जी महाराज द्वारा दिए गए नशामुक्ति, सत्य, अहिंसा और प्रकृति संरक्षण जैसे मानवीय मूल्यों को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य इस दिन के केंद्र में रहता है। बंजारा समाज के ऐतिहासिक योगदान चाहे वह व्यापार में हो या स्वतंत्रता संग्राम में उसको स्मरण करते हुए वीर योद्धाओं और समाजसेवियों को श्रद्धांजलि भी अर्पित की जाती है।
यह दिन केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि अपने गौरवशाली अतीत को याद करते हुए भविष्य की दिशा तय करने का संकल्प भी है।
बंजारा समाज की परंपरा को समझने में संत सेवालाल जी महाराज और रोमा बंजारा समाज के बीच संबंध विशेष महत्व रखता है। यद्यपि संत सेवालाल जी महाराज का समय 18वीं शताब्दी का है और रोमा समुदाय का पलायन लगभग 10वीं शताब्दी में हो चुका था, फिर भी वैचारिक और सांस्कृतिक स्तर पर दोनों को एक ही मूल से जुड़ा माना जाता है। संत सेवालाल जी महाराज को विश्वभर के बंजारा समाज का आराध्य देव और पथप्रदर्शक माना जाता है, और इसी कारण अंतरराष्ट्रीय बंजारा सम्मेलनों में रोमा प्रतिनिधि भी उन्हें अपने पूर्वज और महान सुधारक के रूप में सम्मान देते हैं।
उनके द्वारा स्थापित जीवन मूल्यों का प्रभाव भी इस संबंध को और स्पष्ट करता है। संत सेवालाल जी महाराज ने समाज के लिए 22 नियम निर्धारित किए थे, जिनमें प्रकृति की रक्षा, चोरी और नशे से दूर रहना तथा सादा जीवन जीना प्रमुख थे। रोमा समुदाय की पारंपरिक न्याय व्यवस्था, जिसे ‘रोमानी क्रिस्स’ कहा जाता है, और उनके सामाजिक नियम आज भी इन मूल्यों से काफी हद तक मेल खाते हैं।
प्रकृति और घुमक्कड़ जीवन के प्रति दृष्टिकोण भी दोनों को जोड़ता है। संत सेवालाल जी महाराज ने पशुपालन और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने का संदेश दिया था, जबकि रोमा समाज ने सदियों तक यूरोप के जंगलों और खुले क्षेत्रों में घुमक्कड़ जीवन जीते हुए अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखा। यह जीवन शैली बंजारा संस्कृति के मूल स्वभाव को ही दर्शाती है।
आज जब भारत और विदेशों में विश्व बंजारा दिवस या संत सेवालाल जी महाराज की जयंती मनाई जाती है, तो रोमा समुदाय इसे अपनी पहचान के पुनर्जागरण के रूप में देखता है। उनके लिए यह केवल सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से पुनः जुड़ने का माध्यम है। भाषा के स्तर पर भी यह संबंध स्पष्ट होता है कि संत सेवालाल जी महाराज के भजनों और उपदेशों में प्रयुक्त ‘गोरबोली’ के कई शब्द आज भी रोमा समाज की ‘रोमानी’ भाषा में प्रचलित हैं।
अंततः, यद्यपि संत सेवालाल जी महाराज रोमा समाज के पलायन के काफी समय बाद हुए, फिर भी वे उस व्यापक ‘बंजारा परंपरा’ के आध्यात्मिक केंद्र हैं जिसकी एक शाखा रोमा समाज है। यही कारण है कि आज का रोमा समाज भारत की ओर देखते हुए संत सेवालाल महाराज को अपनी गौरवशाली परंपरा का अभिन्न हिस्सा मानता है।