आचार्य ललित मुनि
वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता ।
वैशाख मास की पूर्णिमा तिथि भारतीय इतिहास में एक असाधारण संयोग की साक्षी है। इसी तिथि को लुम्बिनी वन में सिद्धार्थ गौतम का जन्म हुआ, इसी तिथि को बोधगया की पीपल वृक्ष की छाया में उन्हें सम्बोधि प्राप्त हुई और इसी तिथि को कुशीनगर में उन्होंने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया। यह संयोग किसी दैवीय आख्यान की भाँति लगता है, किन्तु इससे भी महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस एक मानव ने अपने जीवनकाल में भारतीय दर्शन की दिशा को मूलतः परिवर्तित कर दिया।
आज जब हम बुद्ध के दर्शन की चर्चा करते हैं, तो हम केवल 2500 वर्ष पूर्व के किसी महापुरुष की स्मृति नहीं करते, हम उस जीवित विचारधारा से संवाद करते हैं जिसने तर्क, करुणा और मध्यमार्ग को दर्शन का केन्द्र बनाया। लगभग 563 ईसा पूर्व में शाक्य गणराज्य के कपिलवस्तु में सिद्धार्थ गौतम का जन्म हुआ था।
29 वर्ष की आयु में राजमहल का परित्याग करने वाले सिद्धार्थ ने जब वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु के दर्शन किए तो उनके मन में एक मौलिक प्रश्न उठा, इस दुःख का कारण क्या है और इससे मुक्ति का मार्ग क्या है? यह प्रश्न दार्शनिक इतिहास का एक निर्णायक क्षण था। उन्होंने आलार कालाम और उद्दक रामपुत्त जैसे तत्कालीन महान् आचार्यों से शिक्षा ग्रहण की, फिर पाँच सहयोगियों के साथ उग्र तपस्या की, किन्तु दोनों मार्गों से संतुष्ट नहीं हुए। अंततः बोधगया में वट वृक्ष के नीचे ध्यान में बैठकर वैशाख पूर्णिमा की रात्रि को उन्हें वह बोध प्राप्त हुआ जिसने उन्हें 'बुद्ध' बना दिया।
भारतीय दर्शन में बुद्ध का प्रथम और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण योगदान यह था कि उन्होंने वेद प्रामाण्य को अस्वीकार किया। उन्होंने घोषित किया कि किसी विचार की सत्यता उसके स्रोत से नहीं, अपितु उसके तर्कसंगत परीक्षण और व्यक्तिगत अनुभव से प्रमाणित होती है। यह घोषणा अपने समय में एक बड़ी बात थी। जिस समाज में वेद 'अपौरुषेय' अर्थात् ईश्वरकृत माने जाते थे, उस समाज में किसी का यह कहना कि प्रत्यक्ष अनुभव और तर्क श्रुति से श्रेष्ठ प्रमाण हैं। इस एक विचार से उन्होंने भारतीय दर्शन में अनुभवमूलक और तर्कमूलक परम्परा की नींव रखी जो आगे चलकर न्याय दर्शन और आधुनिक वैज्ञानिक चिंतन में विकसित हुई।
बुद्ध का दूसरा महान् योगदान 'अनात्म' अथवा 'अनत्त' का सिद्धान्त है। उपनिषदों ने 'आत्मन् ब्रह्म' की एकता को समस्त दर्शन का केन्द्र माना था। जैन दर्शन भी एक शाश्वत, नित्य आत्मा को स्वीकार करता था। किन्तु बुद्ध ने दोनों को अस्वीकार किया। उन्होंने तर्क दिया कि जो भी हम 'अपना आत्मा' समझते हैं, वह वास्तव में पाँच स्कन्धों का समूह मात्र है। ये पाँच स्कन्ध हैं, रूप (भौतिक शरीर), वेदना (अनुभूति), संज्ञा (बोध), संस्कार (मानसिक संस्कार) और विज्ञान (चेतना)।
इन पाँचों स्कन्धों के अतिरिक्त कोई पृथक् नित्य 'मैं' नहीं है। यह विचार न केवल भारतीय दर्शन के लिए, अपितु विश्व दर्शन के लिए अभूतपूर्व था। 18वीं शताब्दी में यूरोपीय दार्शनिक डेविड ह्यूम ने जब यह कहा कि वे जब भी अपने भीतर झाँकते हैं तो उन्हें कोई स्थायी 'स्व' नहीं मिलता, केवल अनुभवों की एक धारा मिलती है, तो वे वस्तुतः बुद्ध के अनात्म सिद्धान्त के निकट पहुँचे थे। 20वीं सदी के न्यूरोसाइंस ने भी यह प्रमाणित करने का प्रयास किया है कि मस्तिष्क में कोई 'स्व केन्द्र' नहीं होता, केवल तंत्रिका प्रक्रियाएँ होती हैं।
बुद्ध का तीसरा और शायद सर्वाधिक गहन दार्शनिक योगदान 'प्रतीत्यसमुत्पाद' का सिद्धान्त है। इसका सरल अर्थ है, 'इसके होने से वह होता है, इसके न होने से वह नहीं होता।' सभी घटनाएँ अन्योन्याश्रित कारणों और परिस्थितियों पर निर्भर करती हैं। कोई भी वस्तु, व्यक्ति अथवा विचार स्वतंत्र सत्ता नहीं रखता। यह सिद्धान्त आधुनिक पारिस्थितिकी विज्ञान, क्वांटम भौतिकी के अन्योन्याश्रय सिद्धान्तों और प्रणाली सिद्धान्त (systems theory) के साथ आश्चर्यजनक साम्य रखता है।
बुद्ध ने बारह निदानों की एक श्रृंखला बताई जो दुःख की उत्पत्ति को समझाती है। अविद्या से संस्कार, संस्कार से विज्ञान, विज्ञान से नामरूप, और इस प्रकार अन्त में जरा, मृत्यु, शोक और दुःख उत्पन्न होते हैं। इस श्रृंखला को समझना अर्थात् दुःख की जड़ को समझना है। दार्शनिक दृष्टि से यह सिद्धान्त इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह न ईश्वरवादी (जहाँ सब कुछ ईश्वर की इच्छा से होता है) है और न नियतिवादी (जहाँ सब कुछ पूर्वनिर्धारित है)। यह एक तीसरा मार्ग है।
बुद्ध ने दर्शन को केवल सैद्धान्तिक विमर्श तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने चतुर्आर्यसत्य के माध्यम से एक व्यावहारिक दार्शनिक पद्धति प्रस्तुत की। प्रथम सत्य है दुःख का अस्तित्व, द्वितीय सत्य है दुःख की उत्पत्ति तृष्णा से होती है, तृतीय सत्य है दुःख का निरोध संभव है और चतुर्थ सत्य है अष्टांग मार्ग उस निरोध का पथ है। यह संरचना किसी चिकित्सक की पद्धति के समान है, पहले रोग की पहचान, फिर कारण का निर्धारण, फिर रोगमुक्ति की सम्भावना और अंत में उपचार।
अष्टांग मार्ग में सम्मा दिट्ठि (सम्यक् दृष्टि), सम्मा संकप्प (सम्यक् संकल्प), सम्मा वाचा (सम्यक् वाणी), सम्मा कम्मन्त (सम्यक् कर्म), सम्मा आजीव (सम्यक् जीविका), सम्मा वायाम (सम्यक् प्रयास), सम्मा सति (सम्यक् स्मृति) और सम्मा समाधि (सम्यक् समाधि) सम्मिलित हैं। यह नैतिकता (सील), ध्यान (समाधि) और प्रज्ञा (पञ्ञा) की त्रिविध साधना का व्यावहारिक कार्यक्रम है।
बुद्ध का दर्शन केवल आत्मा और मोक्ष के प्रश्नों तक सीमित नहीं था। उन्होंने तत्कालीन समाज की अनेक विषमताओं को भी चुनौती दी। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं होता, कर्म से होता है। 'वसेट्ठ सुत्त' में उन्होंने तर्क दिया कि जिस प्रकार एक वृक्ष को उसके फल से पहचाना जाता है, उसी प्रकार मनुष्य को उसके आचरण से।
भारतीय दर्शन को बुद्ध की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण देन 'मध्यमार्ग' का सिद्धान्त है। एक ओर भोगवादी जीवन था और दूसरी ओर उग्र तपस्या। बुद्ध ने दोनों को अस्वीकार करते हुए एक मध्य मार्ग प्रस्तुत किया जो न तो अतिभोग की अनुमति देता है और न ही देह को कष्ट देने की। वीणा के तार का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि न तो तार को अत्यधिक कसो, न ढीला छोड़ो, मध्य में ही मधुर स्वर निकलता है।
बुद्ध के प्रभाव का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रमाण यह है कि उनके विचारों ने परवर्ती हिन्दू दर्शन को भी पुनर्विचार के लिए बाध्य किया। आदि शंकराचार्य ने बौद्ध विचारधारा का खंडन करते हुए अद्वैत वेदान्त की रचना की। इतिहासकारों ने शंकर की माया और बौद्ध विज्ञानवाद के बीच इतनी समानता पाई कि उन्हें 'प्रच्छन्न बौद्ध' तक कहा गया। रामानुज और माधवाचार्य को भी अपने वैष्णव दर्शन को इस तरह प्रस्तुत करना पड़ा जो बौद्ध चुनौती का उत्तर दे सके।
नागार्जुन (लगभग 150 ई.), वसुबन्धु (लगभग 320 ई.), दिग्नाग (लगभग 480 ई.) और धर्मकीर्ति (लगभग 600 ई.) जैसे बौद्ध दार्शनिकों ने तर्कशास्त्र, ज्ञानमीमांसा और तत्त्वमीमांसा में जो कार्य किया, उसने भारतीय दर्शन की गहराई को अत्यन्त समृद्ध किया। नालन्दा और विक्रमशिला जैसे महाविद्यालय इसी परम्परा के केन्द्र थे जहाँ सम्पूर्ण एशिया से विद्यार्थी आते थे।
बुद्ध की सबसे बड़ी देन शायद करुणा का वह दर्शन है जो अपने समय से बहुत आगे था। 'सर्वे सत्त्वा सुखिनो भवन्तु' अर्थात् सभी प्राणी सुखी हों, यह केवल एक धार्मिक प्रार्थना नहीं, एक नैतिक दर्शन है। बुद्ध ने मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा के चार ब्रह्मविहारों की साधना का जो विधान किया, उसने नैतिकता को एक नया आधार दिया।
बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर जब हम बुद्ध के भारतीय दर्शन में योगदान पर विचार करते हैं, तो एक बात स्पष्ट होती है कि बुद्ध केवल एक धर्म संस्थापक नहीं थे, वे एक ऐसे दार्शनिक थे जिन्होंने मनुष्य को उसके अपने अनुभव, तर्क और करुणा की शक्ति पर भरोसा करना सिखाया। उन्होंने वेद की अपौरुषेयता को चुनौती दी, आत्मा की शाश्वतता पर प्रश्न उठाया, वर्ण व्यवस्था की अनुचितता को उजागर किया और दुःख से मुक्ति का एक व्यावहारिक मार्ग प्रस्तुत किया।
उनका यह कहना कि 'प्रत्येक व्यक्ति अपना दीपक स्वयं है', केवल एक आध्यात्मिक उपदेश नहीं था, यह एक राजनीतिक और दार्शनिक घोषणा थी कि मनुष्य किसी बाह्य सत्ता का मोहताज नहीं, अपनी मुक्ति का स्वयं साधक है। आज जब विश्व अनेक प्रकार की हिंसा, विषमता और मानसिक तनाव से जूझ रहा है, बुद्ध का मध्यमार्ग, उनकी करुणा और उनका तर्कमूलक दृष्टिकोण पहले से अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है।