बोधिसत्त्व डॉ. भीमराव अंबेडकर: सरल नहीं, समरस राष्ट्र का पथ!

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    14-Apr-2026
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कुलदीप नागेश्वर पवार
(पत्रकार एवं शोधार्थी)
 
आज कितनी सहजता से देश में कोई भी व्यक्ति या संगठन किसी भी राष्ट्रनायक या महापुरुष का चित्र हाथों में लेकर उनकी राष्ट्रवादी विरासत और विचारों को ढाल बनाकर अपना उल्लू सीधा कर लेता है। निश्चित ही यह आश्चर्यजनक और विलक्षण है कि जिस अभिव्यक्ति, अधिकार और स्वतंत्रता का मोल उस चित्र में समाए हुए व्यक्ति ने अपने संपूर्ण जीवन-संघर्ष में चुकाया हो, उसे आज वही लोग अपनी ढाल बना रहे हैं, जो उसके वैचारिक धरातल पर दूर-दूर तक भी खड़े नहीं दिखाई देते। बोधिसत्त्व डॉ. भीमराव अंबेडकर और सरदार भगत सिंह के संदर्भ में यह षड्यंत्रपूर्ण घटनाएँ बीते दो दशकों से पूरे देश में तेजी से देखने को मिल रही हैं। गौरतलब है कि ये दोनों ही ऐसे उच्च आदर्श हैं, जो इस 21वीं सदी को दिशा देने का कार्य कर रहे हैं।
 
सरदार भगत सिंह पर चर्चा बाद के लिए छोड़कर, केवल बाबा साहब डॉ. अंबेडकर की जयंती के अवसर पर उन्हीं पर बात करें तो आज का समाज भले ही समृद्ध हो गया है, लेकिन शिक्षित और समरस होने की संभावना में पिछड़ा हुआ है। जो संघर्ष डॉ. अंबेडकर को शिक्षा, सम्मान और स्वीकार्यता के लिए करना पड़ा था, वही आज भी देश के कई गाँवों और कस्बों में दलित समाज के लोगों को करना पड़ रहा है। स्वाधीनता और संवैधानिक व्यवस्था के दशकों बाद भी आज किसी छोटी जाति से आने वाले दूल्हे को घोड़ी से अपमानित कर उतार दिया जाता है, जैसा अनुभव स्वयं बाबा साहब अंबेडकर ने यात्रा के दौरान किया था। आज आवश्यकता है कि उनके विचार राजनीतिक सीमाओं से ऊपर उठकर सामाजिक चेतना का हिस्सा बनें, लेकिन सामाजिक धरातल पर आज भी कई गाँवों में मंदिर प्रवेश हेतु एक दलित स्वजन को उसी अपमान और अनादर से होकर गुजरना पड़ता है, जिसे कभी डॉ. अंबेडकर ने अपने जीवन में भोगा था।
 
अनेक विषमताओं, अपवादों तथा अच्छे-बुरे अनुभवों के बावजूद, मृत्युंजय भारत की सनातनी सांस्कृतिक-वैचारिक परंपरा में वह अमृततुल्य गुण विद्यमान है, जिसने तब से लेकर आज तक इस समूचे राष्ट्र को "विविधता में एकता" के सूत्र में बाँधे रखा है। उस दौर में अनेक असहमतियों और अस्वीकार्यता के बाद भी डॉ. अंबेडकर का जीवन के अंतिम दिनों तक हिंदू धर्म में बने रहना तथा अंततः सनातन परंपरा की ही एक शाखा, बौद्ध धर्म में समाहित हो जाना, उनके सनातन संस्कृति के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और समर्पण का उदाहरण है। किंतु यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज कुछ राष्ट्रविरोधी मानसिकता वाले असामाजिक तत्व डॉ. अंबेडकर का मुखौटा लगाकर समाज में "जय भीम, जय मीम" का नैरेटिव गढ़ते हुए दलित समाज को भ्रमित कर हिंदू समाज को खंडित करने का प्रयास कर रहे हैं। सड़क से लेकर संसद तक ऐसे अनेक दृश्य देखने को मिलते हैं, जहाँ हाथों में चित्र तो डॉ. अंबेडकर का होता है, किंतु भाषा और विचार असंवैधानिक एवं अलगाववादी होते हैं।
 
बाबा साहब अंबेडकर के नाम पर दलित समाज को भ्रमित और आंदोलित करने की मंशा से बनाए गए इन संगठनों, दलों और तथाकथित ‘सेनाओं’ का एकसूत्रीय एजेंडा सामाजिक न्याय के नाम पर भ्रम, अलगाव, अराजकता तथा सेना या संस्थाओं के प्रति अविश्वास फैलाना है, जो कहीं से भी बाबा साहब की मूल भावना के अनुरूप नहीं है। दलित उत्थान का अर्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था से टकराव नहीं, बल्कि संवैधानिक मार्ग से सशक्तिकरण है। अपने समय में स्वयं बाबा साहब ने भी संतुलन और समन्वय की इसी परिपाटी का समर्थन किया, "पूना पैक्ट" इसका लिखित प्रमाण है। जब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने दलितों के राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए पृथक निर्वाचन (Separate Electorates) की माँग की और महात्मा गांधी ने इसका कड़ा विरोध करते हुए यरवदा जेल में आमरण अनशन प्रारंभ किया, तब जो घटनाक्रम हुआ, वह इतिहास में दर्ज है। संभव है कि यदि उस समय डॉ. अंबेडकर के विचार को विधान के रूप में स्वीकार किया गया होता, तो आज का भारत और उसका सामाजिक परिदृश्य कुछ भिन्न होता।
 
नैरेटिव वॉरफेयर के वर्तमान परिदृश्य में मृत्युंजय भारत को आंतरिक स्थिरता और दृढ़ता प्रदान करने हेतु आवश्यक है कि कुछ संगठित समूह और तथाकथित ‘सेनाएँ’, जो समाज में असंतोष और विभाजन को बढ़ावा दे रही हैं, उनकी पहचान कर उनका शांतिपूर्ण, तर्कसंगत और वैचारिक प्रतिकार किया जाए। यह स्मरण रखना चाहिए कि भारत की शक्ति उसकी विविधता में निहित है, और यह विविधता तभी शक्ति बनती है, जब उसमें समरसता का भाव जुड़ा हो। सामाजिक समरसता का अर्थ केवल भेदभाव का अभाव नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान, सहयोग और आत्मीयता का भाव है। यही वह आधार है, जिस पर एक सशक्त और स्थायी राष्ट्र का निर्माण होता है।
 
आत्मनिर्भर भारत का विचार भी इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है। आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक या औद्योगिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक आत्मविश्वास से भी जुड़ी हुई है। जब समाज के सभी वर्ग समान अवसर और सम्मान के साथ आगे बढ़ते हैं, तभी राष्ट्र वास्तविक अर्थों में आत्मनिर्भर बनता है। इस संदर्भ में प्रत्येक नागरिक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। परिवार, शिक्षा और सामाजिक जीवन में हमें समरसता के मूल्यों को प्राथमिकता देनी होगी। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे व्यवहार में किसी भी प्रकार का भेदभाव न हो और हम सभी के प्रति समान दृष्टि रखें। यही वह मार्ग है, जो डॉ. अंबेडकर के सपनों के भारत की ओर ले जाता है।