आयुष पंडाग्रे
पत्रकारिता के विद्यार्थी
उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् ।
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः ।।
भारतवर्ष प्राचीन काल से ही सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक विविधताओं का अद्वितीय संगम रहा है। यहाँ की सभ्यता ने सदैव मानवता, समानता और नैतिक मूल्यों को महत्व दिया है। किंतु इतिहास के विभिन्न कालखंडों में हुए विदेशी आक्रमणों विशेषकर सिकंदर के आक्रमण के पश्चात भारतीय समाज की संरचना पर गहरा प्रभाव पड़ा। समय के साथ समाज में अनेक प्रकार की असमानताएँ, कुरीतियाँ और जड़ताएँ विकसित होती चली गईं।
भारतीय संस्कृति का मूल स्वरूप सदैव उदात्त और समन्वयी रहा है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।” अर्थात जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवताओं का वास होता है। इस आदर्श के आधार पर हमारे समाज में नारी का स्थान अत्यंत सम्माननीय और विशिष्ट रहा है। किंतु विभिन्न आक्रांताओं और बदलती सामाजिक परिस्थितियों के प्रभाव में यह संतुलन धीरे-धीरे कमजोर होता गया।
मुगल शासन से लेकर ब्रिटिश काल तक, भारतीय समाज अनेक सामाजिक विकृतियों से प्रभावित रहा हैं। जातिगत भेदभाव, स्त्री-असमानता, शिक्षा की कमी और सामाजिक विभाजन ने समाज की प्रगति को बाधित किया। इन परिस्थितियों ने भारतीय समाज को भीतर से कमजोर किया और उसके मूल मानवीय मूल्यों को चुनौती दी।
ऐसा माना जाता है कि जब-जब समाज अपने मार्ग से भटकता है, तब उसे सही दिशा देने के लिए कोई महान व्यक्तित्व जन्म लेता है। इसी कारण भारत को “पुण्य भूमि” कहा जाता है, जहाँ समय-समय पर ऐसे महापुरुषों का जन्म हुआ है, जिन्होंने समाज को नई दिशा प्रदान की।
इसी परंपरा में महाराष्ट्र के सतारा जिले के कटगुण में 11 अप्रैल 1827 को गोविंदराव फुले के घर एक बालक का जन्म हुआ। यही बालक आगे चलकर भारतीय समाज के नवजागरण और परिवर्तन का सशक्त माध्यम बना। समाज ने उन्हें एक महान समाजसेवी, सुधारक और राष्ट्रसेवक के रूप में सम्मानित किया। वे थे महात्मा ज्योतिराव फुले।
महात्मा फुले का स्थान भारतीय सामाजिक इतिहास में अत्यंत विशिष्ट है। वे केवल एक सुधारक नहीं थे, बल्कि एक गहन चिंतक, सामाजिक क्रांतिकारी और कुशल संगठनकर्ता भी थे। उनकी विचारधारा समय, समाज और राजनीति के बदलते परिप्रेक्ष्य में निरंतर परिभाषित होती है।
फुले का अध्ययन केवल अतीत को समझने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह वर्तमान भारत के वैचारिक संघर्षों और सामाजिक चुनौतियों को समझने की एक महत्वपूर्ण कुंजी भी है।
ऐतिहासिक संदर्भ और फुले का उद्भव
वह समय गहरे सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों का काल था। एक ओर ब्रिटिश शासन का विस्तार हो रहा था, वहीं दूसरी ओर भारतीय समाज आंतरिक रूप से अनेक समस्याओं से जूझ रहा था। सामाजिक सुधार की महती आवश्यकता थी,
परंतु वे अधिकतर शिक्षित या तथाकथित उच्च वर्ग तक सीमित थे। ज्योतिराव फुले का उदय इस संदर्भ में एक वैकल्पिक और अधिक समावेशी दृष्टिकोण के रूप में हुआ। महात्मा फुले ने समाज के उस वर्ग को केंद्र में रखा, जिस पर सदियों से कोई ध्यान नहीं दिया गया था।
महात्मा फुले के समाज सुधारक अभियान में उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले का योगदान अत्यंत विशिष्ट रहा। उन्होंने 1848 में पुणे में लड़कियों के लिए पहला विद्यालय खोला, उस समय की सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध एक क्रांतिकारी कदम था। यह केवल शिक्षा का प्रसार नहीं था, बल्कि उस मानसिकता को चुनौती देना था, जो महिलाओं और निम्न वर्गों को ज्ञान से वंचित रखती थी।
1873 में उन्होंने ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की, जिसका उद्देश्य सत्य की खोज, सामाजिक समानता और जातिगत भेदभाव का उन्मूलन करना था। इस संगठन ने विवाह और सामाजिक अनुष्ठानों में वैकल्पिक पद्धतियाँ प्रस्तुत कीं, जो समानता और न्याय पर आधारित थीं।
उनकी प्रमुख कृतियाँ
गुलामगिरी (1873): यह उनकी सबसे प्रसिद्ध पुस्तक है, जिसमें उन्होंने जाति व्यवस्था की तीखी आलोचना की है। इस पुस्तक को उन्होंने अमेरिकी गृहयुद्ध के उन वीरों को समर्पित किया जिन्होंने दासों को मुक्त कराया था।
शेतकऱ्यांचा आसूड (किसान का कोड़ा - 1881/1883): इस पुस्तक में फुले ने किसानों पर हुए अत्याचार और उनकी दयनीय स्थिति का चित्रण किया है।
तृतीय रत्न (1855): यह एक नाटक है जिसे फुले की पहली महत्वपूर्ण साहित्यिक रचना माना जाता है। इसमें शिक्षा के महत्व और अंधविश्वास के नुकसानों को दर्शाया गया है ।
ब्राह्मणांचे कसब (ब्राह्मणों की चालाकी - 1869): इस पुस्तक में उन्होंने यह बताने की कोशिश की है कि किस प्रकार धार्मिक ग्रंथों के माध्यम से निम्न जातियों का मानसिक दुरुपयोग किया जाता है।
छत्रपति शिवाजी राजे भोसले यांचा पोवाड़ा (1869): यह वीरगाथा (पोवाड़ा) महान शासक शिवाजी महाराज के जीवन और संघर्ष को समर्पित है।
इशारा (1885): इसमें उन्होंने समाज के दबे-कुचले वर्गों को चेतावनी देते हुए उन्हें जागरूक होने की प्रेरणा दी है
अखंडादि काव्यरचना: यह उनके द्वारा रचित विभिन्न पदों और कविताओं का संग्रह है, जिनमें सत्यशोधक समाज के सिद्धांतों का वर्णन है ।
सार्वजनिक सत्यधर्म पुस्तक (1891): यह उनकी अंतिम पुस्तक थी, जो उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुई। इसमें उन्होंने मानवीय समानता और एक सच्चे ईश्वर की पूजा पर आधारित धर्म की व्याख्या की है ।
ये सभी रचनाएँ आज भी समाज सुधार की चेतना जगाने के लिए प्रासंगिक हैं।
मुख्यधारा विमर्श: संघर्ष और प्रतिरोध
ज्योतिराव फुले को लेकर जो मुख्यधारा का विमर्श विकसित हुआ है, वह उन्हें एक क्रांतिकारी और प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करता है। यह दृष्टिकोण विशेष रूप से वामपंथी, उदारवादी और बहुजन विचारधारा से प्रभावित है।
इस विमर्श के अनुसार, फुले ने सामाजिक संरचना में व्याप्त असमानताओं को केवल सुधारने का प्रयास नहीं किया, बल्कि उनके मूल कारणों को चुनौती दी।
मुख्यधारा का विमर्श
मुख्यधारा विमर्श यह भी मानता है कि फुले आधुनिक बहुजन चेतना के प्रारंभिक सूत्रधार थे। उनके विचारों ने आगे चलकर डॉ. भीमराव अंबेडकर आदि को प्रभावित किया। इस प्रकार, फुले का कार्य सामाजिक न्याय और समानता के लिए एक संगठित आंदोलन के रूप में देखा जाता है।
इस दृष्टिकोण का निष्कर्ष यह है कि फुले का कार्य एक व्यापक सामाजिक क्रांति का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें संघर्ष और प्रतिरोध को आवश्यक माना गया है।
समकालीन प्रासंगिकता
आज के भारत में, जहाँ जाति, पहचान, शिक्षा और सामाजिक न्याय के प्रश्न उठ रहे हैं, वही ज्योतिराव फुले के विचार अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
उनकी विचारधारा हमें यह सिखाती है कि शिक्षा के बिना सामाजिक परिवर्तन संभव नहीं है, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना आवश्यक है, संगठन और जागरूकता समाज सुधार के लिए अनिवार्य हैं महिलाओं और उपेक्षित वर्गों का सशक्तिकरण समाज के विकास का आधार है। आज जब समाज में विभिन्न प्रकार के वैचारिक संघर्ष देखने को मिलते हैं, तब फुले का संतुलित और मानवीय दृष्टिकोण हमें एक नई दिशा प्रदान करता है।
महात्मा फुले का प्रसिद्ध कथन है "बिना कर्म के ज्ञान बेकार है और बिना ज्ञान के कर्म व्यर्थ है" ज्योतिराव फुले का व्यक्तित्व और विचारधारा इतनी व्यापक और बहुआयामी है कि उन्हें किसी एक विचारधारा में सीमित नहीं किया जा सकता। वे एक साथ क्रांतिकारी विचारक, समाज सुधारक और व्यावहारिक कर्मयोगी भी थे। कई लोगों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से फुले की व्याख्या की है,परंतु वास्तविक समझ और विमर्श के बीच संतुलन स्थापित करने में कम ही सफल होते दिखते है।
इसलिए महात्मा फुले को समझने के लिए आवश्यक है कि हम उनके विचारों को किसी एक राजनैतिक/वैचारिक ढाँचे तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें एक व्यापक, संतुलित और आलोचनात्मक दृष्टिकोण से देखें। यही दृष्टिकोण उन्हें आज भी प्रासंगिक, प्रेरणादायक और जीवंत बनाए रखता है।