- डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भारत जैसे विविधतापूर्ण और लोकतांत्रिक देश में गैर-सरकारी संगठन सामाजिक परिवर्तन के महत्वपूर्ण वाहक रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में इन संस्थाओं ने उल्लेखनीय योगदान दिया है, किंतु पिछले कई वर्षों में विदेशी निधि के दुरुपयोग तथा उससे जुड़े धर्मांतरण और सुरक्षा संबंधी मुद्दों ने एक गंभीर बहस को भी जन्म दिया है। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने विदेशी अनुदान नियमन कानून (एफसीआइए) को अधिक सख्त और पारदर्शी बनाने की दिशा में निर्णायक कदम आगे बढ़ा दिए हैं।
कहना होगा कि इसमें कानूनी संशोधन वास्तव में राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक संतुलन और जवाबदेही सुनिश्चित करने का व्यापक प्रयास है। दरअसल, भारत में विदेशी धन के प्रवाह को लेकर यह देखा जा रहा था कि कई गैर-सरकारी संगठन विदेशी अनुदान प्राप्त कर रहे थे, परंतु उनके उपयोग और उद्देश्य को लेकर गंभीर अनियमितताएं सामने आ रही थीं। यही वह पृष्ठभूमि है, जिसने “एफसीआइए” में सख्ती को आवश्यक बना दिया।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, केंद्र में मोदी (भाजपा) सरकार आने के बाद से अब तक 20 हजार से अधिक गैर-सरकारी संगठनों के पंजीकरण रद्द या समाप्त किए जा चुके हैं। वर्तमान में लगभग 16 हजार गैर-सरकारी संगठन ही ऐसे हैं, जिन्हें विदेशी निधि प्राप्त करने की अनुमति है और उन्हें हर वर्ष लगभग 22 हजार करोड़ रुपये की विदेशी सहायता मिलती है। यह आंकड़ा अपने आप में इस बात का संकेत देता है कि विदेशी निधि का दायरा कितना व्यापक है। जब इतनी बड़ी मात्रा में धन देश के भीतर आ रहा हो, तो उसके पारदर्शी और वैध उपयोग को सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी बन जाती है। कई मामलों में यह पाया गया कि संस्थाओं ने निर्धारित उद्देश्यों से हटकर धन का उपयोग किया, लेखा-जोखा प्रस्तुत नहीं किया या फिर धन को अन्य गतिविधियों में स्थानांतरित कर दिया।
धर्मांतरण के आरोप और सामाजिक संवेदनशीलता
गैर-सरकारी संगठनों से जुड़े सबसे संवेदनशील मुद्दों में धर्मांतरण का विषय प्रमुख रहा है। कुछ मामलों में आरोप ही नहीं लगे, प्रमाणों के साथ साक्ष्य रूप में सामने आ गया कि कैसे विदेशी निधि का उपयोग गरीब, आदिवासी और वंचित वर्गों को प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराने में किया गया। सामाजिक सेवा; जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य की आड़ में धार्मिक प्रभाव बढ़ाने के प्रयासों की शिकायतें विशेष रूप से जनजाति क्षेत्र से लगातार सामने आईं और अब भी आ रही हैं।
कुछ संगठनों पर यह आरोप लगे कि उन्होंने सामाजिक कार्यों के माध्यम से धार्मिक उद्देश्य को आगे बढ़ाया। हालांकि, यह भी ध्यान देने योग्य है कि हर मामले में ये आरोप न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हुए हैं, लेकिन इन शिकायतों ने सरकार को सतर्क जरूर किया है। धर्मांतरण का मुद्दा भारत जैसे बहु-धार्मिक समाज में अत्यंत संवेदनशील है, और इससे सामाजिक संतुलन प्रभावित हो सकता है।
विवादों में घिरे प्रमुख संगठन
पिछले वर्षों में कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन जांच के दायरे में आए। कुछ संगठनों पर विदेशी निधि के दुरुपयोग के आरोप लगे, तो कुछ पर नीति-निर्माण को प्रभावित करने या विकास परियोजनाओं का विरोध करने के आरोप सामने आए। उदाहरण के तौर पर, ‘ग्रीनपीस इंडिया’ पर यह आरोप लगा कि उसने विदेशी निधि के माध्यम से भारत की विकास परियोजनाओं के खिलाफ अभियान चलाए, जिससे आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ा। इसी प्रकार, ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया’ को वित्तीय अनियमितताओं के कारण अपने संचालन को सीमित करना पड़ा।
नीतिगत संस्थानों में ‘सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च’ और ‘ऑक्सफैम इंडिया’ जैसे अनेक संगठनों पर अब तक कार्रवाई हुई, जहां विदेशी निधि के उपयोग को लेकर सवाल उठे हैं। राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में राजीव गांधी फाउंडेशन और राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट के विदेशी अंशदान विनियमन पंजीकरण रद्द किए गए। वस्तुत: सुरक्षा एजेंसियों की नजर में कुछ संगठनों की गतिविधियां अधिक गंभीर पाई गईं। पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया और उससे जुड़े रिहैब इंडिया फाउंडेशन पर कट्टरपंथ और विदेशी निधि के दुरुपयोग के आरोप सिद्ध हुए। वहीं इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन, जिसकी स्थापना जाकिर नाइक ने की थी, पर वैचारिक कट्टरता फैलाने के आरोप सामने आते रहे हैं।
सख्ती और पारदर्शिता की दिशा में कदम
इन परिस्थितियों को देखते हुए केंद्र सरकार ‘विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में संशोधन का प्रस्ताव लेकर सामने आई है। इस संशोधन का मुख्य उद्देश्य विदेशी निधि के उपयोग को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और नियंत्रित बनाना है। प्रस्तावित संशोधन के तहत यदि किसी गैर-सरकारी संगठन का पंजीकरण रद्द हो जाता है, तो उसके द्वारा विदेशी धन से निर्मित संपत्तियों को जब्त करने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा, इन संपत्तियों के प्रबंधन के लिए केंद्र और राज्य स्तर पर एक विशेष प्राधिकरण स्थापित करने की योजना है।
साथ ही, पंजीकरण के नवीनीकरण और विदेशी अनुदान के उपयोग के लिए समय-सीमा निर्धारित करने का भी प्रावधान किया गया है। यदि कोई संस्था समय पर नवीनीकरण नहीं कराती या उसका आवेदन अस्वीकार हो जाता है, तो वह स्वतः विदेशी निधि प्राप्त करने के अधिकार से वंचित हो जाएगी।
सरकार का पक्ष और तर्क
वस्तुत: गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने संसद में इस विधेयक का समर्थन करते हुए स्पष्ट किया कि यह कानून उन तत्वों के खिलाफ सख्त कदम है, जो विदेशी निधि का उपयोग व्यक्तिगत लाभ, जबरन धर्मांतरण या राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए करते हैं। सरकार का मानना है कि 2010 के विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में कई प्रावधान अस्पष्ट थे, जिनका लाभ उठाकर कुछ संस्थाएं नियमों का उल्लंघन कर रही थीं। नए संशोधन के माध्यम से इन कमियों को दूर करने का प्रयास किया गया है, ताकि पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।
समग्र रूप से देखा जाए तो विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन शासन व्यवस्था में पारदर्शिता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा का महत्वपूर्ण प्रयास है। निश्चित ही विदेशी निधि के दुरुपयोग, धर्मांतरण और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों ने सरकार को सख्त कदम उठाने के लिए प्रेरित किया है। यदि यह कानून लागू किया जाता है, तो यह देश में चल रहीं अनियमितताओं पर अंकुश लगाने के साथ ही देश में कार्यरत विश्वसनीय और ईमानदार गैर-सरकारी संगठनों के लिए एक स्वच्छ, जवाबदेह और विश्वासपूर्ण वातावरण भी सुनिश्चित करेगा। अंततः, यही किसी भी लोकतांत्रिक समाज की मजबूती का आधार है और इसी पर आज केंद्र की मोदी सरकार प्रखरता के साथ चलती दिखाई दे रही है।