-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
रुपया 94 के पार चला गया है। यह निश्चित ही हर भारतीय के लिए एक गूंजती हुई चेतावनी है, एक ऐसा अलार्म, जिसे हम सुनकर भी अनसुना कर रहे हैं। हम कारण गिनाते हैं, कच्चे तेल की कीमतें बढ़ गईं, डॉलर मजबूत हो गया, विदेशी निवेशक पैसा निकाल रहे हैं, परन्तु वास्तविकता यह है कि ये कारण नहीं, परिणाम हैं। असली वजह है भारत की बढ़ती विदेशी निर्भरता और स्वदेशी के प्रति हमारी उपेक्षा का भाव का होना!
सोमवार को रुपया 94.03 प्रति डॉलर के स्तर तक गिर गया है। इससे पहले भी यह 93.53 पर बंद हुआ था। विदेशी निवेशकों ने हजारों करोड़ रुपये के शेयर बेच डाले। विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट आई। हमें समझना होगा कि यह कोई अचानक घटित घटना नहीं है, बल्कि एक लंबे समय से चल रही प्रक्रिया का परिणाम है और इसका मूल कारण है हमारी आर्थिक संरचना की कमजोरी। हम जितना उत्पादन करते हैं, उससे कहीं अधिक उपभोग करते हैं और वह भी विदेशी वस्तुओं पर हमारी निर्भरता निरंतर बढ़ती ही जा रही है।
यह तथ्य है कि भारत आज अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल, अर्धचालक, रक्षा उपकरण सब कुछ विदेशों से आता है। यहां तक कि बच्चों के खिलौनों और त्योहारों की सजावट तक में भी विदेशी वस्तुओं का प्रभुत्व है। जब हम हर छोटी बड़ी जरूरत के लिए विदेशों पर निर्भर होंगे, तब स्वाभाविक है कि विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ेगी और रुपया गिरेगा। यह कोई जटिल अर्थशास्त्र नहीं है, सीधी सच्चाई है कि जो देश अधिक खरीदता है और कम बेचता है, उसकी मुद्रा कमजोर होती है।
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ‘पॉल क्रुगमैन’ ने कहा था कि “दीर्घकाल में उत्पादकता ही सब कुछ है।” दरअसल पॉल क्रुगमैन एक प्रसिद्ध अमेरिकी अर्थशास्त्री, लेखक और अकादमिक हैं। उन्हें मुख्य रूप से 'न्यू ट्रेड थ्योरी' और 'न्यू इकोनॉमिक जियोग्राफी' में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए जाना जाता है।अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार भी इन्हें मिला है, जब वे इस बात पर जोर देते हैं, तब हम सोचें कि उनके कहे अनुसार हम भारतीय कहां खड़े हुए हैं?
हालांकि ये सच है कि केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद भारत ने उत्पादकता को भी अपनी प्राथमिकता में लाना आरंभ किया है, किंतु फिर भी अधिकांश यही दिखाई देता है कि हमने सेवा क्षेत्र की चमक में खुद को खोया हुआ है। सूचना प्रौद्योगिकी और सेवा उद्योग की सफलता ने हमें यह भ्रम दे दिया कि हम आर्थिक महाशक्ति बन रहे हैं, जबकि सच्चाई यह है कि सेवा क्षेत्र सीमित विदेशी मुद्रा ही ला सकता है, विश्व में असली ताकत विनिर्माण और निर्यात में ही होती है।
चीन ने यही किया। उसने अपने गांव-गांव में कारखाने स्थापित किए, बड़े पैमाने पर उत्पादन किया और पूरी दुनिया को अपना बाजार बना लिया। परिणामस्वरूप उसकी मुद्रा स्थिर बनी रही। वहीं अमेरिका ने तकनीक, नवाचार और मजबूत संस्थाओं के बल पर अपनी मुद्रा को वैश्विक स्तर पर सर्वोच्च बना दिया।
अर्थशास्त्री डारोन एसमोग्लू और जेम्स ए. रॉबिन्सन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'व्हाई नेशंस फेल' में लिखा है कि मजबूत संस्थाएं और उत्पादन क्षमता ही किसी राष्ट्र की स्थायी समृद्धि का आधार होती हैं। इस पुस्तक का सार है यह है, “किसी देश की सफलता या विफलता उसकी संस्कृति, भूगोल या मौसम पर नहीं, बल्कि वहां की संस्थाओं पर निर्भर करती है। जिसमें कि समावेशी संस्थाएँ समाज के बड़े हिस्से को आर्थिक गतिविधियों में भाग लेने की अनुमति देती हैं, संपत्ति के अधिकारों की रक्षा करती हैं और नवाचार को प्रोत्साहित करती हैं। ऐसे देश समृद्ध होते हैं।”
अब हम विचार करें कि कहां खड़े हैं। वस्तुत: हम एक ऐसे उपभोक्ता समाज में बदलते जा रहे हैं, जिसे उत्पादन से अधिक उपभोग करता आता है और वह भी विदेशी वस्तुओं का उपभोग तो हमें अत्यंत ही प्रिय है। यहीं पर स्वदेशी सिर्फ एक विचार से कहीं अधिक देश के हित में एक अनिवार्यता बन जाता है। इसलिए ही प्रसिद्ध आर्थिक चिंतक ‘दत्तोपंत ठेंगड़ी’ ने अपनी पुस्तक ‘द थर्ड वे’ में पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों के विकल्प के रूप में एक तीसरा मार्ग प्रस्तुत किया है, जिसे उन्होंने 'हिंदू अर्थशास्त्र' या 'सनातन धर्म' पर आधारित आर्थिक मॉडल कहा है।
उनका कहना रहा, “भारत को अपनी आर्थिक नीतियां अपनी परिस्थितियों और सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप बनानी चाहिए। उनका स्वदेशी मॉडल सिर्फ आर्थिक नीति न होकर राष्ट्रीय आत्मसम्मान का विषय होना चाहिए। जब तक हम अपने ही देश में बने उत्पादों को प्राथमिकता नहीं देंगे, तब तक हम आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं हो सकते हैं।” लेकिन आज का भारतीय समाज बहुतायत में विदेशी ब्रांड की ओर भागता नजर आ रहा है। आयातित शब्द हमें आकर्षित करता है।
कहना होगा कि यही मानसिकता ही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है। अर्थशास्त्री एस गुरुमूर्ति बार बार कहते हैं कि भारत की वास्तविक शक्ति उसके लघु उद्योगों और घरेलू बचत में निहित है। सभी को ये समझना होगा कि जब आप विदेशी उत्पाद खरीदते हैं, तब-तब आप अपने ही देश के किसी मजदूर, कारीगर या छोटे उद्यमी की आजीविका छीनते हैं। आप अपने ही देश की मुद्रा पर दबाव डालते हैं और अंततः अपने ही भविष्य को कमजोर करते हैं। आज हम उसी स्थिति में खड़े हैं, राजकोषीय घाटा बढ़ रहा है, मुद्रास्फीति चिंता का विषय है और रुपया लगातार गिर रहा है।
यह सच है कि देश में आर्थिक सुधारों की चर्चा बहुत होती है। सुब्रमण्यम स्वामी ने कर प्रणाली को सरल बनाने और बाजार को अधिक स्वतंत्र करने की बात कही। बिबेक देबरॉय ने प्रशासनिक सुधारों और कानूनों के सरलीकरण को आवश्यक बताया। संजीव सान्याल ने आर्थिक नीतियों को तथ्यों और आंकड़ों पर आधारित बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया, किंतु जब तक इन विचारों को जमीन पर लागू नहीं किया जाएगा, तब तक रुपया मजबूत नहीं हो सकता है, यह भी समझ लेना आवश्यक है।
अत: इस पूरी चर्चा का निष्कर्ष यही है कि प्रत्येक भारतवासी के जीवन में स्वदेशी हो। दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानवदर्शन के सिद्धांत में हमें यही बताया है कि विकास का उद्देश्य समाज का संतुलित विकास होना चाहिए। यदि स्थानीय उद्योग मजबूत होंगे, तो रोजगार बढ़ेगा, आय बढ़ेगी और अंततः अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी। आज भारत के सामने स्पष्ट विकल्प है या तो हम विदेशी निर्भरता की इस राह पर चलते रहें और रुपये को गिरते हुए देखते रहें या फिर स्वदेशी को अपनाकर आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ें।
समझें; अगर हम आज भी नहीं जागे, तो कल रुपया 100 के पार जाएगा और हम सिर्फ आंकड़े गिनते-गिनाते रह जाएंगे, पर यदि हमने स्वदेशी को अपने जीवन का हिस्सा बना लिया, तब अवश्य ही यह तय है कि हमारा रुपया एक दिन विश्व भर में मजबूती से खड़ा होगा। अब निर्णय हमारे हाथ में है, विदेशी निर्भरता की गुलामी या स्वदेशी का स्वाभिमान!