अभिषेक पवन तिवारी
आज राममनोहर लोहिया जी की जन्मजयंती है। भारतीय राजनीति के इस विलक्षण चिंतक को अक्सर केवल ‘समाजवादी’ या ‘गैर-कांग्रेसवाद’ के प्रवर्तक के रूप में याद किया जाता है, जबकि उनका व्यक्तित्व इससे कहीं अधिक व्यापक था। उनके चिंतन में एक ऐसा भारतीय बोध दिखाई देता है जो राजनीतिक परिवर्तन को सांस्कृतिक चेतना से जोड़कर देखता है। उनके जीवन के उत्तरार्ध में यह दृष्टि और अधिक स्पष्ट होकर सामने आई और इस परिवर्तन के पीछे राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख का सान्निध्य और वैचारिक संवाद एक महत्वपूर्ण कारण माना जाता है।
स्वाधीनता संग्राम से समाज परिवर्तन तक
23 मार्च 1910 को उत्तर प्रदेश के अकबरपुर में जन्मे लोहिया जी का राजनीतिक जीवन स्वाधीनता आंदोलन की तपिश में विकसित हुआ। वे महात्मा गांधी के निकट सहयोगियों में रहे और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भूमिगत रहकर सक्रिय भूमिका निभाई। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने ‘सप्तक्रांति’ का विचार प्रस्तुत किया, जिसका उद्देश्य केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक अन्याय के विरुद्ध व्यापक परिवर्तन था। उनके समाजवादी चिंतन का विस्तार उनके लेखों और व्याख्यानों में मिलता है, जिनका संकलन उनकी प्रसिद्ध कृति मार्क्स, गांधी और समाजवाद में भी देखा जा सकता है।
नानाजी देशमुख और सांस्कृतिक दृष्टि
बहुत कम लोग जानते हैं कि डॉ. राममनोहर लोहिया के विचारों के विकास का एक महत्वपूर्ण अध्याय 1960 के दशक में उनका श्री नानाजी देशमुख के साथ वैचारिक संपर्क भी है। नानाजी, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्पित प्रचारक और बाद में ग्रामोदय के महान प्रयोगकर्ता बने, उनके संपर्क में आने के बाद लोहिया जी के चिंतन को एक नया आयाम मिला।
इस विषय की महत्वपूर्ण जानकारी मुझे लखनऊ में देश के प्रख्यात लेखक, विचारक और वरिष्ठ पत्रकार श्री दयानंद पांडेय जी से भेंट और विस्तृत चर्चा के दौरान प्राप्त हुई। दयानंद जी का नानाजी देशमुख के साथ निकट संपर्क रहा है और उन्होंने समय-समय पर नानाजी के साथ संवाद और साक्षात्कार भी किए हैं। उनके अनुसार, 1960 के दशक में लोहिया जी और नानाजी के बीच हुए वैचारिक संवाद ने लोहिया के चिंतन में भारतीय सांस्कृतिक संदर्भों की अभिव्यक्ति को और स्पष्ट किया।
यह संवाद इस विचार के इर्द-गिर्द था कि भारत में सामाजिक परिवर्तन पश्चिम से आयातित वैचारिक ढाँचों से नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और लोकचेतना की आधारभूमि से ही संभव है। इसी कालखंड में उनके विचारों में सांस्कृतिक संदर्भ अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगते हैं।
लोहिया जी का प्रसिद्ध निबंध राम, कृष्ण और शिव इसी दृष्टि का उदाहरण है, जिसमें उन्होंने राम, कृष्ण और शिव को भारतीय समाज के सांस्कृतिक और नैतिक प्रतीकों के रूप में प्रस्तुत किया। भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों की इस व्याख्या पर कई विद्वानों ने भी ध्यान दिया है, जिनमें इंदुमति केलकर की पुस्तक लोहिया : एक अध्ययन उल्लेखनीय है।
अक्सर यह धारणा भी प्रचारित की जाती है कि डॉ लोहिया अनीश्वरवादी थे, जबकि उनके लेखन से स्पष्ट है कि वे भारतीय सनातन सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा के गंभीर अध्येता और सम्मानपूर्ण आस्थावान थे। उन्होंने धर्म को समाज की नैतिक चेतना और सांस्कृतिक प्रेरणा का स्रोत माना।
चित्रकूट में ‘रामायण मेला’ की परिकल्पना भी इसी सांस्कृतिक दृष्टि का परिणाम थी, जिसका उद्देश्य भारतीय लोकसंस्कृति और सामाजिक चेतना के संबंध को पुनः स्थापित करना था।
पं. दीनदयाल जी उपाध्याय से संवाद
लोहिया जी के वैचारिक जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय पं० दीनदयाल जी उपाध्याय के साथ उनका संवाद भी है। 1964 में दोनों के बीच एक संयुक्त वक्तव्य सामने आया, जिसमें राष्ट्रीय एकता और समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान के प्रश्नों पर सहमति व्यक्त की गई। इसी दौर में लोहिया जी ने भारतीय जनसंघ के कार्यकर्ता वर्गों में भी संवाद किया। यह उस समय की राजनीति में एक उल्लेखनीय उदाहरण था।
सामाजिक न्याय और समरसता
डॉ० लोहिया के ‘सामाजिक न्याय’ का उद्देश्य समाज को विभाजित करना नहीं, बल्कि उसे समरस बनाना था। उनका ‘जाति तोड़ो’ आंदोलन इसी सोच का प्रतीक था। उनका मानना था कि जब तक समाज का एक बड़ा वर्ग सम्मान और अवसर से वंचित रहेगा, तब तक राष्ट्र की शक्ति पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो सकती।
आज दुर्भाग्य से अनेक राजनीतिक दल उनके नाम का उपयोग करके जातीय राजनीति करते दिखाई देते हैं, जबकि लोहिया जी का मूल विचार सामाजिक समरसता और सम्मानपूर्ण समाज की स्थापना था।
12 अक्टूबर 1967 को लोहिया जी का निधन हुआ, किंतु उनका वैचारिक प्रभाव आज भी प्रासंगिक है। श्रद्धेय नानाजी और पं० दीनदयाल जी जैसे व्यक्तित्वों के साथ उनके संवाद यह संकेत देते हैं कि भारत में स्थायी परिवर्तन सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक समरसता के आधार पर ही संभव है।
इस अर्थ में लोहिया जी की विरासत केवल समाजवाद तक सीमित नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रबोध से जुड़ी एक व्यापक वैचारिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है।