-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
जब पूरी दुनिया ऊर्जा आपूर्ति के संकट से जूझ रही हो, समुद्री मार्ग बाधित हो चुके हों और वैश्विक अर्थव्यवस्था अस्थिरता के दौर से गुजर रही हो, तब यदि कोई देश अपने नागरिकों को स्थिरता और भरोसा दे सके तो यह उसकी नीतिगत मजबूती का प्रमाण होता है। पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने की स्थिति ने जिस प्रकार विश्व व्यवस्था को हिला दिया, उसी समय भारत ने संतुलित कूटनीति और दूरदर्शी ऊर्जा रणनीति के माध्यम से यह साबित कर दिया कि उसकी विदेश नीति वास्तविक परिणाम देने वाली कूटनीति है।
वस्तुत: यह स्थिति विपक्ष खासकर राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के उन आरोपों को स्वतः खारिज करती है, जो लंबे समय से देश की ऊर्जा और विदेश नीति को लेकर केंद्र की मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास करते रहे हैं।
वैश्विक परिदृश्य पर दृष्टि डालने पर स्पष्ट हो जाता है कि होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने का प्रभाव संपूर्ण विश्व पर हुआ है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि विश्व के लगभग बीस प्रतिशत तेल की आपूर्ति इसी मार्ग से होती है। इस मार्ग के अवरुद्ध होते ही ब्रेंट क्रूड की कीमतें एक समय 120 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गईं। यूरोप के कई देशों में ईंधन के लिए लंबी कतारें लग गईं और अमेरिका, कनाडा तथा एशिया के अनेक देशों में पेट्रोल की कीमतों में भारी वृद्धि दर्ज की गई। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसियों ने आपूर्ति में भारी कमी की आशंका जताई। इसके विपरीत भारत में स्थिति पूरी तरह नियंत्रित रही। पेट्रोल की कीमतों में स्थिरता बनी रही और रसोई गैस की आपूर्ति बिना किसी बाधा के जारी रही।
इस पूरे परिदृश्य में विपक्ष की भूमिका पर भी प्रश्न उठना स्वाभाविक है। जो विपक्ष हर मुद्दे पर सरकार की आलोचना करता है, वह इस सफलता को स्वीकार करने से क्यों बच रहा है? क्या यह राजनीतिक बाध्यता है या वास्तविकता को नकारने की प्रवृत्ति! लोकतंत्र में स्वस्थ आलोचना आवश्यक होती है, लेकिन तथ्यों की अनदेखी करना और निराधार आरोप लगाना लोकतांत्रिक मूल्यों के बिल्कुल भी अनुकूल नहीं माना जा सकता है।
विपक्ष द्वारा लगातार यह कहा जाता रहा है कि भारत की विदेश नीति में स्पष्टता का अभाव है और मोदी सरकार सिर्फ छवि निर्माण में लगी हुई है। वर्तमान संकट ने इन आरोपों को कठोर वास्तविकता के सामने ला खड़ा किया है। जब दुनिया के विकसित देश भी ऊर्जा आपूर्ति को लेकर असहाय नजर आए, तब भारत ने अपने नागरिकों के लिए स्थिर व्यवस्था सुनिश्चित की। यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि यदि नीति कमजोर होती तो क्या यह संभव था? निश्चित ही विपक्ष के पास इस प्रश्न का कोई ठोस उत्तर दिखाई नहीं देता।
पिछले एक सप्ताह के घटनाक्रम को देखें तो भारत की तैयारी स्पष्ट रूप से सामने आती दिखी है। अमेरिका के टेक्सास से एलपीजी लेकर एक जहाज मेंगलुरु बंदरगाह पहुंचता है, वहीं रूस से कच्चा तेल लेकर दूसरा पोत भारत आता है। केवल सात दिनों में गैस और कच्चा तेल लेकर पांच जहाजों का भारत पहुंचना इस बात का संकेत है कि देश ने पहले ही अपने ऊर्जा स्रोतों का विस्तार कर लिया था। 18 मार्च को जग लाडकी नामक टैंकर मुंद्रा बंदरगाह पहुंचा जिसमें लगभग 80886 मीट्रिक टन कच्चा तेल था। इससे पहले शिवालिक और नंदा देवी नामक जहाज 16 और 17 मार्च को पहुंचे जिनमें करीब 92000 मीट्रिक टन एलपीजी थी।
यहां देखने में आया कि स्थिति उस समय जरूर चुनौतीपूर्ण हो गई थी, जब फारस की खाड़ी में जहाज फंसे हुए थे और इन जहाजों का होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरना कठिन हो गया था। यही वह क्षण था जब भारतीय विदेश नीति एवं कूटनीति की वास्तविक परीक्षा हुई। ईरान ने भारतीय जहाजों को अपने यहां से निकलने की विशेष अनुमति दी और अपनी नौसेना के माध्यम से सुरक्षित मार्ग प्रदान किया। स्वभाविक तौर पर यह घटना अंतरराष्ट्रीय संबंधों में विश्वास और संतुलन के महत्व को स्पष्ट करती है। यह भी स्पष्ट होता है कि भारत ने वर्षों से सभी प्रमुख देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखे हैं, जिसका लाभ संकट के समय भारत को मिला है।
इस संदर्भ में यह भी समझना आवश्यक है कि भारत ने अपने ऊर्जा आयात के स्रोतों को व्यापक बनाया है। जिन देशों से पहले लगभग छब्बीस स्रोतों से ऊर्जा प्राप्त होती थी, वह संख्या बढ़कर चालीस के आसपास पहुंच गई है। अमेरिका, रूस, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और खाड़ी देशों के साथ ऊर्जा संबंधों का विस्तार इस नीति का हिस्सा है। इससे किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम हुई और आपूर्ति में लचीलापन आया। यही कारण है कि एक क्षेत्र में संकट होने के बावजूद भारत की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित नहीं हुई।
घरेलू स्तर पर इसके प्रभाव को समझना और भी महत्वपूर्ण है। भारत में तैंतीस करोड़ से अधिक परिवार रसोई गैस पर निर्भर हैं। वर्तमान संकट के दौरान इन परिवारों तक बिना किसी रुकावट के एलपीजी पहुंचती रही है। देश में पेट्रोल की कीमतों में भी स्थिरता बना रहना आज बता रहा है कि भारत ने अपने नागरिकों को वैश्विक संकट के प्रभाव से बचाने में सफलता प्राप्त की है।
प्रधानमंत्री स्तर पर ईरान एवं अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों से बातचीत होना और विदेश मंत्रालय द्वारा निरंतर संपर्क बनाए रखना आज दर्शाता है कि यह संवाद भारत के लिए परिणामकारी रहा है। भारतीय जहाजों की सुरक्षित आवाजाही और ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता इसी का प्रमाण है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश गया कि भारत संवाद के माध्यम से समाधान खोजने में विश्वास रखता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की भूमिका भी इस संकट के दौरान मजबूत हुई है। कई देशों ने भारत को एक संभावित मध्यस्थ के रूप में देखना शुरू किया है। यह स्थिति बताती है कि वर्तमान भारत वैश्विक राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने में अग्रणी देश है। यहां यही कहना सही होगा कि वर्तमान ऊर्जा संकट ने भारत की विदेश नीति और ऊर्जा रणनीति की प्रभावशीलता को सिद्ध कर दिया है। विपक्ष के आरोप इस वास्तविकता के सामने टिक नहीं पाते हैं। भारत ने यह दिखाया है कि यदि नीति स्पष्ट हो और नेतृत्व दृढ़ हो तब उस स्थिति में वैश्विक संकट को भी अवसर में परिवर्तित किया जा सकता है।
अत: आज भारत एक आत्मविश्वासी राष्ट्र के रूप में सभी के सामने खड़ा है, जोकि अपने हितों की रक्षा करते हुए विश्व समुदाय के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने में सक्षम है। यह सफलता; कह सकते हैं कि उस व्यापक दृष्टिकोण की है, जिसमें भारत ने ‘सभी के साथ, किसी के खिलाफ नहीं’ की नीति अपनाई है। यही नीति आज उसे वैश्विक मंच पर एक विश्वसनीय और संतुलित शक्ति के रूप में स्थापित कर रही है।