-डॉ भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 23 मार्च का दिन किसी परिचय का मोहताज नहीं है। यह वह दिन है जब काल ने स्वयं को रोक लिया था और भारत माता के तीन वीर सपूत भगत सिंह, सुखदेव थापर और शिवराम राजगुरु ने हँसते-हँसते फांसी के फंदे को चूमकर शहादत का एक नया कीर्तिमान स्थापित किया था। यह आलेख इन महान क्रांतिकारियों के जीवन, उनकी विचारधारा, उनके अटूट साहस और उस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का विस्तृत विवेचन है जिसने भारत की आजादी की नींव को पुख्ता किया।
साइमन कमीशन और लालाजी का बलिदान
इस महान क्रांति की नींव 1928 में पड़ी, जब ब्रिटिश सरकार ने भारत में संवैधानिक सुधारों की समीक्षा के लिए 'साइमन कमीशन' भेजा। इस कमीशन में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था, जिसके कारण पूरे देश में "साइमन गो बैक" के नारे गूंज उठे। 30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में इस कमीशन के विरोध में एक विशाल शांतिपूर्ण जुलूस निकाला गया, जिसका नेतृत्व 'पंजाब केसरी' लाला लाजपत राय कर रहे थे।
तत्कालीन ब्रिटिश पुलिस अधीक्षक जेम्स ए. स्कॉट ने इस शांतिपूर्ण भीड़ पर बर्बर लाठीचार्ज का आदेश दिया। लालाजी के सीने पर कई लाठियां लगीं, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए। अस्पताल के बिस्तर से उन्होंने गर्जना की "मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत की आखिरी कील साबित होगी।" 17 नवंबर 1928 को लालाजी शहीद हो गए। इस घटना ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु जैसे युवा क्रांतिकारियों के भीतर प्रतिशोध और पूर्ण स्वतंत्रता की ज्वाला को प्रचंड कर दिया।
सॉन्डर्स वध: क्रांति का पहला प्रहार
लालाजी की मृत्यु का बदला लेने की जिम्मेदारी 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) ने उठाई। योजना जेम्स स्कॉट को मारने की थी, लेकिन 17 दिसंबर 1928 को पहचान में चूक होने के कारण सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन पी. सॉन्डर्स कोतवाली से बाहर निकला।
राजगुरु ने पहली गोली चलाई जो सॉन्डर्स के माथे पर लगी, और उसके गिरते ही भगत सिंह ने उस पर गोलियों की बौछार कर दी।
चंद्रशेखर आजाद ने कवरिंग फायर दिया ताकि ये तीनों सुरक्षित निकल सकें। अगले दिन पूरे लाहौर में पर्चे चिपका दिए गए, जिन पर लिखा था "सॉन्डर्स मर गया, लाला लाजपत राय की मौत का बदला ले लिया गया है।" इस घटना ने ब्रिटिश साम्राज्य के अहंकार को सीधी चुनौती दी।
परिचय: बलिदान की अमर त्रिवेणी
क. शहीद-ए-आजम भगत सिंह: वैचारिक क्रांति के प्रणेता
28 सितंबर 1907 को पंजाब के लायलपुर (अब पाकिस्तान) में जन्मे भगत सिंह एक क्रांतिकारी परिवार से थे। उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह स्वयं स्वतंत्रता सेनानी थे। मात्र 12 वर्ष की आयु में जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद भगत सिंह ने वहां की रक्त-रंजित मिट्टी को माथे से लगाकर कसम खाई थी कि वे देश को आजाद कराएंगे। वे केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि एक प्रकांड विद्वान भी थे। उन्होंने जेल में रहते हुए 'मैं नास्तिक क्यों हूँ' (Why I am an Atheist) जैसा प्रसिद्ध लेख लिखा। उनकी दृष्टि में आजादी केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि एक ऐसे समाज की स्थापना थी जहां मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण न हो।
ख. सुखदेव थापर: संगठन के चाणक्य
15 मई 1907 को लुधियाना में जन्मे सुखदेव थापर भगत सिंह के अभिन्न मित्र और HSRA के वैचारिक स्तंभ थे। वे संगठन की नीतियों और गुप्त गतिविधियों के मुख्य रणनीतिकार थे। सुखदेव की सांगठनिक क्षमता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि लाहौर षड्यंत्र केस में उन्हें ही मुख्य आरोपी माना गया था। वे अनुशासन के पक्के थे और जेल के भीतर भी क्रांतिकारियों को संगठित रखने का कार्य करते रहे।
ग. शिवराम राजगुरु: अचूक निशानेबाज
महाराष्ट्र के पुणे जिले के खेड़ा गाँव में 24 अगस्त 1908 को जन्मे राजगुरु बचपन से ही साहसी और जिद्दी स्वभाव के थे। वे संस्कृत के विद्वान थे और काशी में अध्ययन के दौरान क्रांतिकारियों के संपर्क में आए। शिवाजी महाराज की 'छापामार युद्ध कला' के प्रशंसक राजगुरु का निशाना कभी नहीं चूकता था। वे सादगी और निस्वार्थ सेवा के प्रतीक थे।
सेंट्रल असेंबली बम कांड: बहरी सरकार को चेतावनी
भगत सिंह का मानना था कि सॉन्डर्स वध ने क्रांतिकारियों को पहचान तो दिलाई, लेकिन आम जनता को जोड़ने के लिए एक बड़े धमाके की जरूरत है। 8 अप्रैल 1929 को जब ब्रिटिश सरकार 'पब्लिक सेफ्टी बिल' और 'ट्रेड डिस्प्यूट बिल' जैसे काले कानूनों को पारित कर रही थी, तब भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में खाली बेंचों पर बम फेंके।
बम का धमाका किसी की हत्या के लिए नहीं, बल्कि विरोध दर्ज कराने के लिए था। धमाके के बाद उन्होंने भागने के बजाय अपनी गिरफ्तारी दी और चिल्लाकर नारा लगाया "इंकलाब जिंदाबाद!"। असेंबली में फेंके गए पर्चों पर स्पष्ट लिखा था "बहरों को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत होती है।"
जेल का संघर्ष और ऐतिहासिक भूख हड़ताल
गिरफ्तारी के बाद भगत सिंह और उनके साथियों को लाहौर जेल लाया गया। यहाँ उन्होंने देखा कि भारतीय कैदियों के साथ जानवरों जैसा व्यवहार किया जाता था, जबकि गोरे कैदियों को बेहतर सुविधाएँ मिलती थीं। इसके विरोध में क्रांतिकारियों ने भूख हड़ताल शुरू की।
यह दुनिया की सबसे लंबी भूख हड़तालों में से एक थी। जतिन दास ने 63 दिनों तक अन्न का दाना नहीं लिया और शहादत प्राप्त की। 64 दिनों तक चली इस भूख हड़ताल ने पूरे भारत में अंग्रेजों के खिलाफ जनमत तैयार कर दिया। ब्रिटिश सरकार डर गई और अंततः उसे कैदियों की माँगें माननी पड़ीं।
लाहौर षड्यंत्र केस और सजा-ए-मौत
7 अक्टूबर 1930 को एक विशेष न्यायाधिकरण (Tribunal) ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को सॉन्डर्स की हत्या और ब्रिटिश सम्राट के विरुद्ध युद्ध छेड़ने के आरोप में फांसी की सजा सुनाई। पूरे देश में इस फैसले के खिलाफ रैलियां निकलीं, लेकिन ब्रिटिश हुकूमत अडिग रही।
जेल में रहते हुए इन क्रांतिकारियों ने अपने अंतिम दिनों को भी उत्सव की तरह मनाया। वे किताबें पढ़ते, गाते और आपस में चर्चा करते। फांसी से कुछ समय पहले जब वकील उनसे मिलने आए, तो भगत सिंह ने मुस्कुराकर कहा "आप भारत माता के चरणों में मेरा अंतिम प्रणाम कहिएगा।"
वह कालजयी शाम: 23 मार्च 1931
फांसी की तारीख 24 मार्च 1931 तय की गई थी। लेकिन लाहौर जेल के बाहर जमा होती लाखों की भीड़ को देख अंग्रेज सरकार के हाथ-पांव फूल गए। उन्होंने नियमों के विपरीत 23 मार्च की शाम 7 बजकर 33 मिनट पर ही फांसी देने का निर्णय लिया।
जब जेलर फांसी की सूचना देने कोठरी में गया, तो भगत सिंह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। उन्होंने कहा "ठहरो! एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है।" पन्ना खत्म करने के बाद वे उठे और अपने दोनों साथियों के साथ फांसी के तख्ते की ओर बढ़ चले। तीनों ने एक-दूसरे के गले लगकर 'इंकलाब जिंदाबाद' और 'साम्राज्यवाद का नाश हो' के नारे लगाए। फांसी के फंदे को उन्होंने खुद अपने गले में डाला और झूल गए।
जेल के पीछे की दीवार तोड़कर उनके शवों को ले जाया गया और फिरोजपुर के पास सतलुज नदी के किनारे मिट्टी का तेल डालकर जला दिया गया। हालांकि अंग्रेज उनकी देह को मिटा सके, लेकिन उनके विचारों को नहीं।
भगत सिंह का समाजवाद और वर्तमान प्रासंगिकता
आज के दौर में भगत सिंह के विचार और भी महत्वपूर्ण हो गए हैं। वे केवल राजनीतिक आजादी के पक्षधर नहीं थे; वे आर्थिक और सामाजिक न्याय चाहते थे। उनका मानना था कि "क्रांति की तलवार विचारों के पत्थर पर घिसने से तेज होती है।" उन्होंने सांप्रदायिकता के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया था और धर्म को राजनीति से अलग रखने की बात कही थी।
उनके विचार आज के युवाओं को प्रेरित करते हैं कि वे केवल अपने स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि देश और समाज के उत्थान के लिए जिएं। उनका 'इंकलाब' अन्याय के खिलाफ खड़ा होने का जज्बा है।
अमरत्व की प्राप्ति
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत ने वह चिंगारी सुलगाई जो 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' तक एक महाज्वाला बन गई। इन तीनों वीरों ने सिद्ध कर दिया कि राष्ट्र की वेदी पर प्राणों की आहुति देना ही सबसे बड़ा सम्मान है।
आज बलिदान दिवस पर पूरा भारत उनके चरणों में नमन करता है। उनके बलिदान की गूंज आज भी हर भारतीय के हृदय में
सुनाई देती है:
"शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।"
जय हिंद। इंकलाब जिंदाबाद! भारत माता की जय!धी है, उतनी ही आज जानबूझकर उलझा दी गई है। मैं यह बात किसी नारे के रूप में नहीं कह रहा, बल्कि इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि आज जो स्थिति हम देख रहे हैं, उसमें अगर इस मूल बात को नहीं समझा गया, तो बाकी सारी चर्चा बेकार है।
सबसे पहले हमें खुद से एक ईमानदार सवाल पूछना पड़ेगा। हम बार-बार कहते हैं कि हम 100 से 110 करोड़ हिंदू हैं। ठीक है, मान लिया। लेकिन इनमें कितने लोग वेदों को प्रमाण मानते हैं? कितने लोग आत्मा, ब्रह्म, पुनर्जन्म और कर्म सिद्धांत को मानते हैं? कितने लोग मूर्ति पूजा को स्वीकार करते हैं? कितने लोग यह समझते हैं कि ज्ञान मार्ग, कर्म मार्ग और भक्ति मार्ग तीनों वैदिक परंपरा के अंग हैं?
अगर हम इन सवालों का जवाब देने लगें, तो सच्चाई सामने आ जाएगी कि संख्या बहुत है, लेकिन आधार बहुत कमजोर है।
शास्त्र की बात बिल्कुल साफ है “वेदोऽखिलो धर्ममूलम्।” वेद ही धर्म का आधार हैं। उपनिषद उसी का विस्तार हैं। गीता उसी का सार है। इसलिए यह कोई राय नहीं है, यह परिभाषा है हिंदू वही है जो वेदों को प्रमाण मानता है। जो आत्मा और ब्रह्म को स्वीकार करता है, जो पुनर्जन्म और कर्म सिद्धांत को मानता है, जो साकार और निराकार दोनों को स्वीकार करता है, जो मूर्ति पूजा को स्वीकार करता है वही हिंदू है। इसके बाहर जो है, वह चाहे खुद को कुछ भी कहे, वह इस परंपरा के भीतर नहीं आता।
अब यहीं से असली समस्या शुरू होती है, और हम उससे भाग रहे हैं।
आज हमारे सामने एक बड़ा वर्ग है जो खुद को हिंदू कहता ही नहीं। कोई कहता है मैं बौद्ध हूँ, कोई कहता है मैं द्राविड़ हूँ, कोई कहता है मैं मूल निवासी हूँ, कोई लिंगायत, कोई सरना, कोई सिख। सबने अलग पहचान बना ली है। और यह अलग पहचान केवल नाम की नहीं है यह वैचारिक अलगाव है।
लेकिन हमारे अपने हिंदू संगठन और तथाकथित विचारक क्या कर रहे हैं? “एकता” के नाम पर, “समरसता” के नाम पर, सबको जबरदस्ती हिंदू कह रहे हैं। यह भावनात्मक बात हो सकती है, लेकिन यह वास्तविकता नहीं है। जो वेदों को नहीं मानता, उसे आप बोल देने से हिंदू नहीं बना सकते।
और अगर हम यह स्पष्ट नहीं करेंगे, तो वही होगा जो पिछले तीन हजार वर्षों से होता आया है।
महाभारत के बाद जैसे-जैसे वैदिक आधार कमजोर हुआ, वैसे-वैसे अवैदिक मतों का प्रभाव बढ़ा। बौद्ध और जैन परंपराएँ आईं उन्होंने वेदों को प्रमाण नहीं माना। उस समय यह केवल दर्शन का अंतर लग सकता था, लेकिन धीरे-धीरे उसका असर समाज पर पड़ा। मौर्य काल में, खासकर अशोक के समय, बौद्ध धर्म को राज्य संरक्षण मिला। सातवीं शताब्दी में ह्वेनसांग लिखता है कि हजारों बौद्ध विहार थे—इसका मतलब क्या है? यही कि वैदिक संतुलन टूट चुका था।
और जब संतुलन टूटता है, तो समाज बिखरता है। छोटे-छोटे राज्य बने, आपसी शक्ति कमजोर हुई।
फिर बाहरी आक्रमण शुरू हुए लगभग हजार वर्षों तक। मंदिर तोड़े गए, धर्मांतरण हुए, जनसंख्या घटी यह सब इतिहास में दर्ज है। लेकिन फिर भी हिंदू समाज खत्म नहीं हुआ। क्यों? क्योंकि कुछ लोग अभी भी वेदों के आधार पर टिके हुए थे। आत्मा, ब्रह्म, कर्म यह विश्वास बचा हुआ था।
लेकिन अब जो स्थिति है, वह और खतरनाक है।
आज बाहरी शत्रु तो हैं ही इस्लाम, क्रिश्चियनिटी, वामपंथ, और आज की ग्लोबल मार्केट फोर्सेज ये सब अपने एजेंडा के साथ काम कर रहे हैं। लेकिन इनसे भी बड़ा खतरा भीतर से है।
जो लोग आज खुद को हिंदू नहीं कहते वही आगे चलकर विरोध में खड़े होते हैं। इतिहास में यही हुआ है। उत्तर-पश्चिम भारत गांधार, तक्षशिला, बामियान ये सब बौद्ध प्रभाव वाले क्षेत्र थे। लेकिन इस्लामी आक्रमणों के समय वही क्षेत्र सबसे पहले टूटे और अंत में पूरी तरह इस्लामी हो गए। आज अफगानिस्तान में न बौद्ध बचे, न हिंदू सब समाप्त हो गया।
यह कोई संयोग नहीं है—यह प्रक्रिया है। पहले वेदों से दूरी, फिर अलग पहचान, फिर बाहरी शक्ति के सामने समर्पण या सहयोग, और अंत में पूर्ण परिवर्तन।
आधुनिक उदाहरण भी हमारे सामने हैं।
सिख परंपरा की शुरुआत हिंदू रक्षा के लिए हुई थी। गुरु तेग बहादुर का बलिदान इसका प्रमाण है। रणजीत सिंह के समय एक बड़ा साम्राज्य था गांधार तक शासन था। लेकिन कुछ ही समय में दिशा बदल गई। 1980 से 90 के दशक में खालिस्तान आंदोलन में हजारों हिंदुओं की हत्या हुई। जो रक्षा के लिए खड़ा हुआ था, वही भीतर से हिंसा का कारण बना यह सोचने की बात है।
दक्षिण भारत में पेरियार का आंदोलन जिसने ब्राह्मणों और सनातन परंपरा के खिलाफ जहर फैलाया—आज भी उसका असर दिखता है। समाज बंट गया, दूरी बढ़ गई।
जोगेंद्र नाथ मंडल उन्होंने हिंदू समाज से अलग होकर पाकिस्तान का साथ दिया। कुछ ही वर्षों में उन्हें वहाँ से भागना पड़ा। यह उदाहरण बहुत कुछ बता देता है।
अब एक और गंभीर बात हम “सबको समान” करने के चक्कर में हैं। यह विचार सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन यह पूरी तरह प्रकृति के खिलाफ है। गीता कहती है कि प्रकृति तीन गुणों से बनी है सत्त्व, रज, तम। हर व्यक्ति अलग है। समाज में भी भेद है।
फिर हम सबको एक जैसा मानने का आग्रह क्यों कर रहे हैं?
समता का मतलब न्याय है, लेकिन समानता का मतलब सबको एक जैसा बना देना नहीं है। जब हम यह फर्क नहीं समझते, तब विकृति पैदा होती है।
आज जो जाति के नाम पर विभाजन हो रहा है, उसमें भी यही गलती है। “दलित”, “पिछड़ा”, “आदिवासी”, “मूलवासी”, “सवर्ण” ये शब्द हमारी परंपरा के नहीं हैं। अंग्रेजों ने समाज को बांटने के लिए ये वर्ग बनाए। 1932 का कम्युनल अवॉर्ड, बाद में संविधान, फिर मंडल आयोग सबने इसे स्थायी पहचान बना दिया।
फिर मार्क्सवाद आया—समाज को “शोषक” और “शोषित” में बाँट दिया। आज वही सोच हमारे यहाँ चल रही है।
जब आप किसी को बार-बार बताते हैं कि “तुम पीड़ित हो” और दूसरे को कहते हैं “तुम दोषी हो”, तो समाज टूटेगा ही। यह सीधी बात है।
और सबसे बड़ी कमी धर्म का ज्ञान समाज तक पहुँच ही नहीं रहा। जिनका काम था वेदों का अध्ययन और प्रसार करना, वे ही अपने कर्तव्य से दूर हो गए। मठ, मंदिर, पीठ इनकी जिम्मेदारी थी कि समाज को दिशा दें, लेकिन यह काम व्यापक रूप से नहीं हो रहा।
अगर आज भी हर गाँव में बुनियादी धर्म शिक्षा दी जाए वेद क्या हैं, आत्मा क्या है, कर्म क्या है तो स्थिति बदल सकती है। लेकिन इसके लिए इच्छा और संगठन दोनों चाहिए।
अंत में बात बहुत स्पष्ट है हमें भावनात्मक एकता नहीं, वैचारिक स्पष्टता चाहिए। यह स्पष्ट करना ही होगा कि हिंदू कौन है। जो वेदों को प्रमाण नहीं मानता, वह हिंदू नहीं हो सकता। और इतिहास गवाह है कि जो वैदिक आधार से अलग होता है, वह अंततः विरोध में खड़ा होता है चाहे वह प्राचीन काल हो या आधुनिक।
“वेदाः रक्षन्ति रक्षिताः” यह केवल वाक्य नहीं, चेतावनी है। अगर हम वेदों की रक्षा करेंगे, तो वही हमारी रक्षा करेंगे। अगर हम उन्हें छोड़ देंगे, तो कोई संख्या, कोई नारा, कोई राजनीति हमें नहीं बचा पाएगी।
अब निर्णय हमें करना है सत्य के साथ खड़े होना है या संख्या के भ्रम में जीते रहना है।