राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
अखिल भारतीय कार्यकारी मण्डल 2026
2,3,4 नवम्बर 2026, इन्दौर
माननीय सरकार्यवाह जी का वक्तव्य
राजनारायण बसु : राष्ट्रीय चेतना के अग्रदूत
भारत का स्वाधीनता संग्राम भारतीय इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है। ब्रिटिश आक्रमण जैसा सर्वंकष था वैसा ही समग्र हमारा उत्तर था। ब्रिटिशों के आक्रमण के कारण हमारा शिक्षित समाज अपने मूल से कट कर आत्मविस्मृति का शिकार होकर आत्मगौरव से शून्य हो रहा था। उस समय अनेक महापुरुषों ने राष्ट्रीय चेतना जगाने और राष्ट्र के स्वरूप की सुस्पष्ट कल्पना के लिए प्रभावी प्रयास किये उनमें राजनारायण बसु का नाम अग्रणी है।
7 दिसंबर 1826 को बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के बोराल गांव में जन्मे राजनारायण बसु का द्विशताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है। अपनी शिक्षा के बाद उन्होंने संस्कृत विद्यालय में अध्यापन कार्य करते हुए अपने जीवन को सामाजिक सुधार के कार्य हेतु समर्पित कर दिया। विशेष रूप से निर्धनों के उत्थान, नशा मुक्ति, महिलाओं में शिक्षा प्रसार और विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए उन्होंने विशेष प्रयास किए थे। इस दृष्टि से उन्होंने अपने भाई का विवाह एक विधवा से करा कर समाज के समक्ष एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया।
शिक्षित वर्ग में राष्ट्रीय चेतना जागृत कर उनमें आत्मगौरव और आत्मविश्वास का भाव विकसित करने के लिए उन्होंने अनथक प्रयास किए। उनका मानना था कि इन गुणों के बिना किसी भी राष्ट्र का उत्थान संभव नहीं है।
अपने उदेश्यों की प्राप्ति के लिए उन्होंने 'राष्ट्रीय भाव' के संवर्धन हेतु एक संस्था (Prospectus of a Society for Promotion of National Feeling) की रचना का प्रारूप तैयार किया। उनके निरंतर प्रयासों के परिणामस्वरूप नवगोपाल मित्र द्वारा 1867 से प्रारम्भ किया गया 'हिन्दू मेला' राष्ट्रीय भाव के पोषण और संवर्धन का एक महत्वपूर्ण मंच बनकर उभरा। राजनारायण बसु ने स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग का प्रबल समर्थन किया और हिन्दू मेले के माध्यम से स्वदेशी भाव को आगे बढ़ाया।
मातृभाषा के प्रयोग के महत्व पर वे सदैव बल देते थे और उनका मानना था कि मातृभाषा आत्मसम्मान और राष्ट्रीय चेतना की महत्वपूर्ण आधारशिला है। वे हिन्दू धर्म को भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता का आधार मानते थे।
1873 मे उन्होंने "हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता" (The Superiority of Hinduism) नामक ग्रन्थ की रचना की, जिसमें उन्होंने हिन्दू संस्कृति के दार्शनिक सामर्थ्य और विशिष्टताओं को अभिव्यक्त किया। भारत की राष्ट्रीय चेतना के पितामह के रूप में विख्यात राजनारायण बसु ने "महा हिन्दू समिति" की परिकल्पना सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय जागरण के एक आधारभूत माध्यम के रूप में की थी। उन्होंने इस योजना का उल्लेख 1880 के दशक में प्रकाशित अपनी प्रसिद्ध पुस्तिका 'वृद्ध हिन्दूर आशा' (The Old Hindu's Hope) में किया था।
राजनारायण बसु महर्षि श्री अरविन्द के नाना थे। उनके विचारों और राष्ट्रवादी दृष्टि ने युवा अरविन्द को गहरे रूप से प्रभावित किया था
राष्ट्रीय पुनर्जागरण और स्वतंत्रता आंदोलन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर, स्वामी विवेकानंद और भगिनी निवेदिता सहित अनेक नायक उनके प्रति श्रद्धा और सम्मान का भाव रखकर प्रेरणा प्राप्त करते थे।
राष्ट्रीय चेतना के अग्रदूत, महान देशभक्त, समाज सुधारक और दूरदर्शी व्यक्तित्व के धनी राजनारायण बसु की 200 वी जयंती के अवसर पर हम उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं। उनके द्वारा प्रस्तुत विचार और दर्शन आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं तथा हमें आत्मगौरव, सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव और राष्ट्रीय एकता के शाश्वत महत्व का स्मरण कराते हैं। राष्ट्र उनके प्रति सदैव कृतज्ञ रहेगा।