भारत की तुलना नहीं की जा सकती, जॉर्डन, माइक्रोनेशिया, फिलीपींस, श्रीलंका, वियतनाम से!

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    02-Nov-2026
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भारत की तुलना नहीं की जा सकती, जॉर्डन, माइक्रोनेशिया, फिलीपींस, श्रीलंका, वियतनाम से!
 
 
 
 
- डॉ. मयंक चतुर्वेदी
वरीष्ठ पत्रकार 
 
 
 
विश्व बैंक ने अपना वार्षिक आय वर्गीकरण जारी किया तो दुनिया भर में चर्चा छिड़ गई। जॉर्डन, माइक्रोनेशिया, फिलीपींस, श्रीलंका और वियतनाम पाँच देशों ने निम्न-मध्यम आय की श्रेणी छोड़कर अपर-मिडिल इनकम में प्रवेश कर लिया। सीमा $4,636 प्रति व्यक्ति प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय थी। भारत, जिसकी जीडीपी $3.95 ट्रिलियन के आसपास पहुँच चुकी है और जो दुनिया की सबसे तेज बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है। कई अर्थशास्त्री और राजनीतिक टिप्पणीकार तुरंत तुलना करने लगे कि वियतनाम और फिलीपींस आगे निकल गए, भारत पीछे रह गया।
 
 
ऐसे में यहां कहना यही है कि ये तुलना की ही नहीं जा सकती है, क्‍योंकि भारत का क्षेत्रफल, राज्य और जनसांख्‍य‍िकी इस तरह की है कि इन देशों के सामने भारत के कई राज्‍य बड़े हैं, जिसमें कि प्रतिराज्‍य आय भी अलग-अलग है। फिर आप जब इन देशों के आंतरिक राज्‍यों के आंकड़ों को देखेंगे तो उनमें उस समान तुलनात्‍म‍क स्‍थ‍िति में भारत के कई राज्‍य आज आगे दिखाई देते हैं।
 
 
अब यह तुलना भले ही आकर्षक लगती हो, किंतु गहराई से देखें तो यह अधूरी और कई मामलों में भ्रामक है। भारत कोई एक समरूप अर्थव्यवस्था नहीं है। यह 32.87 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल और 1.45 अरब आबादी वाला एक विशाल संघ है, जिसके भीतर आर्थिक स्तर इतने विविध हैं कि कई राज्य इन पाँच देशों के बराबर या उनसे बड़े हैं और प्रति व्यक्ति आय तथा संरचनात्मक परिवर्तन के मामले में आगे भी हैं।
 
 
उदाहरण स्‍वरूप आज आप दिल्ली, कर्नाटक, तेलंगाना, तमिलनाडु और गुजरात जैसे राज्यों को ही ले सकते हैं। पहले ही उच्‍च-मध्‍यम मानकों को व्यक्तिगत स्तर पर पार कर चुके हैं। राष्ट्रीय औसत को लेकर इन छोटे देशों से भारत की तुलना करना उसी तरह है, जैसे एक बड़े राज्य के पूरे जिले की औसत आय को एक छोटे देश से तुलना करके निष्कर्ष निकाल लिया जाए और फिर उन्‍हें आथों में लेकर लहराना शुरू किया गया हो।
 
 
विश्व बैंक का वर्गीकरण एटलस विधि से गणना की गई सकल राष्ट्रीय आय (जीएनआई) प्रति व्यक्ति पर आधारित होता है और हर साल एक जुलाई को अद्यतन किया जाता है। एफवाई 27 के लिए अपर-मिडिल की नई सीमा $4,636 से $14,375 तय हुई। वियतनाम की प्रति व्यक्ति आय लगभग $4,680–$4,970 के आसपास पहुँची, फिलीपींस $4,720–$4,850, जॉर्डन $4,880–$5,260, श्रीलंका $4,650–$4,670 और माइक्रोनेशिया $4,950 के आसपास। ये आंकड़े प्रभावशाली हैं, खासकर उन देशों के लिए जो कुछ वर्ष पहले आर्थिक संकट या संक्रमण से गुजर रहे थे। श्रीलंका 2022 के संकट से उबरकर वापस अपर-मिडिल में आया, वियतनाम ने निर्यात-आधारित विनिर्माण से छलांग लगाई। भारत का औसत $2,760 होने का मतलब यह नहीं कि पूरा देश उसी स्तर पर खड़ा है।
 
 
वस्‍तुत: हमें हमेशा ही यह ध्‍यान रखना चाहिए कि भारत एवं इन देशों के बीच क्षेत्रफल और जनसंख्या का अंतर ही इतना बड़ा है कि प्रत्यक्ष तुलना अर्थ खो देती है। वियतनाम का क्षेत्रफल (3,31,210 वर्ग किमी) राजस्थान (3,42,239 वर्ग किमी) के लगभग बराबर है। फिलीपींस (लगभग 3 लाख वर्ग किमी) मध्य प्रदेश (3,08,252 वर्ग किमी) से मेल खाता है। जॉर्डन (89,342 वर्ग किमी) और बिहार (94,163 वर्ग किमी) का क्षेत्रफल लगभग समान है। श्रीलंका हिमाचल प्रदेश से थोड़ा बड़ा है, जबकि माइक्रोनेशिया गोवा से बहुत छोटा। जब इन देशों की जनसंख्‍या और भारतीय राज्यों की आबादी को साथ रखकर देखें तो अंतर और स्पष्ट हो जाता है। जॉर्डन में लगभग 1.16 करोड़ लोग रहते हैं, बिहार में 13 करोड़ से अधिक। वियतनाम की आबादी 10 करोड़ के आसपास है, राजस्थान की 8.35 करोड़। यह जनसांख्यिकीय भार प्रति व्यक्ति आय को सीधे प्रभावित करता है।
 
 
मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन (एमओएसपीआई) के 2025-26 और 2026-27 के अग्रिम अनुमानों के आधार पर राज्य-स्तरीय आंकड़े देखें तो तस्वीर और साफ होती है। राजस्थान की प्रति व्यक्ति आय लगभग $2,420 है, जो वियतनाम से काफी पीछे है। राजस्थान अभी भी कृषि पर 27 प्रतिशत से अधिक निर्भर है, जबकि वियतनाम ने द्वितीयक क्षेत्र को 38.5 प्रतिशत तक पहुँचाकर खुद को वैश्विक विनिर्माण हब के रूप में स्थापित कर लिया।
 
 
मध्य प्रदेश में कृषि का योगदान 40 प्रतिशत से अधिक है और प्रति व्यक्ति आय $1,850 के आसपास, जबकि फिलीपींस ने सेवा क्षेत्र (खासकर बीपीओ और रेमिटेंस) को 62 प्रतिशत तक पहुँचाकर $4,720 पार कर लिया। बिहार की प्रति व्यक्ति आय लगभग $830 (लगभग ₹69,000–76,000 के आसपास) है, जो भारत का सबसे निचला स्तर है। जॉर्डन ने सीमित आबादी को उच्च-मूल्य सेवाओं से जोड़कर $4,880 से ऊपर पहुँच लिया। गोवा की प्रति व्यक्ति आय $7,000 से अधिक है, जो इन पाँचों देशों से आगे है। कर्नाटक की प्रति व्यक्ति नेट स्टेट डोमेस्टिक प्रोडक्ट (शुद्ध राज्य घरेलू उत्पाद) ₹4.33 लाख के आसपास पहुँच चुकी है, जो वियतनाम और फिलीपींस दोनों से बेहतर है। तमिलनाडु और गुजरात भी तेजी से ऊपर आ रहे हैं।
 
 
महाराष्ट्र का सकल राज्य घरेलू उत्पाद $450 बिलियन के आसपास पहुँच रहा है, जो वियतनाम की पूरी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के करीब है। कर्नाटक का आईटी निर्यात मॉडल फिलीपींस की राजधानी मनीला के बीपीओ मॉडल से तकनीकी रूप से अधिक उच्च-मूल्य वाला है। तमिलनाडु इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में पिछले दो वर्षों में इतनी तेजी से बढ़ा है कि आईफोन असेंबलिंग के क्षेत्र में वियतनाम की स्थिति को चुनौती दे रहा है। गुजरात का गिफ्ट सिटी वित्तीय सेवाओं में जॉर्डन के बैंकिंग हब से प्रतिस्पर्धा करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।
 
 
वस्‍तुत: ये सभी आंकड़े बता रहे हैं कि भारत के भीतर पहले से ही कुछ उप-राष्ट्रीय क्षेत्र अपर मिडिल या उससे ऊपर की ओर बढ़ रहे हैं। यहां नीतिगत स्तर पर भी तुलना भी बड़ी दिलचस्प है। वियतनाम ने अक्टूबर 2025 से अपना नया कॉर्पोरेट आयकर कानून लागू किया है, जो ओईसीडी के पिलर टू (द्वितीय स्तंभ) वैश्विक न्यूनतम कर के अनुरूप है।
 
 
यहां इसे भी समझ लें। ओईसीडी का पिलर टू एक अंतरराष्ट्रीय कर सुधार है, जिसे आर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) और जी20 देशों ने मिलकर तैयार किया है। इसका मुख्य उद्देश्य बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा मुनाफे को कम कर वाले देशों (टैक्स हेवन्स) में ट्रांसफर करके टैक्स बचाने (बेस इरोजन एंड प्रॉफिट शिफ्टिंग) यानी कर आधार का क्षरण एवं लाभ का कृत्रिम स्थानांतरण, पर रोक लगाना है।
 
 
इसकी मानक दर 20 प्रतिशत है। सेमीकंडक्टर, एआई, नवीकरणीय ऊर्जा और अनुसंधान एवं विकास जैसे क्षेत्रों में 15 वर्षों तक 10 प्रतिशत की रियायती दर और टैक्स हॉलिडे का प्रावधान है। विशेष आर्थिक क्षेत्रों में चार साल तक 100 प्रतिशत और उसके बाद नौ साल तक 50 प्रतिशत छूट मिलती है। वैश्विक न्यूनतम कर लागू होने के बाद वियतनाम ने बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए इन्वेस्टमेंट सपोर्ट फंड (निवेश सहायता कोष) बनाया है, जो टैक्स छूट के नुकसान की भरपाई नकद सब्सिडी से करता है। उसके मुक्त व्यापार समझौते (ईवीएफटीए, सीपीटीपीपी, आरसीईपी) व्यापक हैं और लॉजिस्टिक्स लागत जीडीपी का 8-9 प्रतिशत है।
 
 
भारत में ‘मेक इन इंडिया’ और उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं के तहत नई विनिर्माण कंपनियों के लिए प्रभावी कर दर 22-25 प्रतिशत के आसपास है। धारा 115बीएबी के तहत 15 प्रतिशत की रियायती दर का सनसेट क्लॉज समाप्त हो चुका है। भारत का मुख्य हथियार नकद प्रोत्साहन है। 14 क्षेत्रों के लिए लगभग $26 बिलियन (₹1.97 लाख करोड़) का बजट आवंटित है, जिसमें कंपनियों को वृद्धिशील बिक्री पर 4-6 प्रतिशत का सीधा प्रोत्साहन मिलता है।
 
 
सेमीकंडक्टर के लिए “इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन” के तहत परियोजना लागत का 50 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता दी जाती है। भारत का मॉडल प्रदर्शन-आधारित है, जबकि वियतनाम टैक्स हॉलिडे और सीमा शुल्क छूट पर अधिक निर्भर है। लॉजिस्टिक्स लागत भारत में अभी भी 13-14 प्रतिशत है, हालांकि पीएम गति शक्ति और समर्पित फ्रेट कॉरिडोर इसे कम करने की कोशिश कर रहे हैं।
 
 
हां, यह जरूर है कि तीन बड़े स्‍तरों पर अभी ओर अधिक कार्य किया जाना चाहिए- पहला, कृषि और रोजगार का असंतुलन दूर करना है। क्‍योंकि भारत के कई बड़े राज्यों में 40 प्रतिशत से अधिक अर्थव्यवस्था अभी भी प्राथमिक क्षेत्र में कार्यरत है, जिससे उत्पादकता कम रहती है और छिपी हुई बेरोजगारी बनी रहती है। दूसरा, महिला श्रम भागीदारी। भारत में 32-35 प्रतिशत है। जब तक आधी जनसंख्‍या आर्थिक रूप से सक्रिय नहीं होगी, प्रति व्यक्ति आय में तेज छलांग मुश्किल है। तीसरा, लॉजिस्टिक्स और आंतरिक बाधाओं के कारण से राज्य से राज्य सामान भेजने की लागत अभी भी ऊँची है।
 
 
वस्‍तुत: ये चुनौतियाँ ‘मध्य आय जाल’ की ओर इशारा करती हैं। कई देश अपर-मिडिल आय में पहुँचकर ठहर जाते हैं क्योंकि वे सस्ते श्रम और बुनियादी विनिर्माण से आगे नहीं बढ़ पाते। भारत को इससे बचना है। समाधान राष्ट्रीय औसत बढ़ाने के साथ-साथ राज्य-स्तरीय होना चाहिए। पिछड़े राज्यों को वियतनाम की तरह श्रम-गहन क्लस्टर्स (टेक्सटाइल, फुटवियर, इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली) बनाने होंगे। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर औद्योगिक पार्क स्थापित करने से कृषि पर निर्भर आबादी को विनिर्माण में रोजगार मिल सकता है। जिस दिशा में इन दिनों कार्य होता हुआ भी दिख रहा है।
 
 
दूसरी ओर एक देश के स्‍तर पर तमाम चुनौतियों के बावजूद भारत की प्रगति गरीबी में कमी के आंकड़ों में दिखती है। विश्व बैंक की अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट बता ही रही है कि 2011 से 2023 के बीच भारत ने लगभग 49.6 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला है। यह बदलाव वास्‍तव में बहुत अहम है। रोजगार के मोर्चे पर भी उल्लेखनीय प्रगति हुई। 2017 से 2023 के बीच रोजगार में लगभग 13.4 करोड़ लोगों की वृद्धि हुई, जो कामकाजी उम्र की आबादी में हुई वृद्धि का लगभग दोगुना है। इसका एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण महिलाओं के वेतन वाले काम में आने से आया, जिससे प्रति परिवार कमाने वालों की संख्या बढ़ी और घरेलू आय में सुधार हुआ। आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत जीडीपी में तेज गति से बढ़ रहा है और लाखों लोगों के जीवन स्तर को भी ऊपर उठा रहा है।
 
 
भारतीय स्टेट बैंक की रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार यदि अर्थव्यवस्था मौजूदा रफ्तार से बढ़ती रही तो 2030 तक भारत अपर-मिडिल श्रेणी में पहुँच जाएगा। ये हम सभी को समझना होगा कि भारत की ताकत उसकी विविधता में है। एक तरफ गोवा और दिल्ली जैसे क्षेत्र हैं जो पहले से विकसित देशों की ओर बढ़ रहे हैं, दूसरी तरफ बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य जनसंख्या घनत्व के कारण संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर औसत को लेकर छोटे देशों से भारत की तुलना करना सच पूछें तो वास्तविकताओं को छुपा देता है, इसलिए कहना यही है कि जॉर्डन, वियतनाम या फिलीपींस से भारत की सीधी तुलना उतनी उपयोगी नहीं जितनी राज्यों के स्तर पर तुलना परस्‍पर होते रहने की आवश्‍यकता है। आज गरीबी में ऐतिहासिक कमी और रोजगार में वृद्धि दिखाती है कि भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है।