डॉ. भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार
कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका परिचय केवल उनके पद, दायित्व अथवा कार्यों से नहीं होता, बल्कि उनके जीवन की सादगी, व्यवहार की आत्मीयता और ध्येयनिष्ठा से होता है। ऐसे लोग अपने संपर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति के मन पर एक अमिट छाप छोड़ जाते हैं। उनका जीवन स्वयं में एक संदेश होता है और उनका सान्निध्य जीवन की दिशा को समझने का अवसर प्रदान करता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक विनोद जी भाई साहब का व्यक्तित्व भी मेरे लिए ऐसा ही प्रेरणास्रोत रहा है।
आज जब उनके निधन का समाचार प्राप्त हुआ, तो मन अतीत की उन स्मृतियों में चला गया, जिनमें उनसे हुई पहली भेंट, उनका सहज व्यवहार, संगठन के प्रति उनकी निष्ठा और राष्ट्रकार्य के लिए जीवन समर्पित करने वाले प्रचारक का आदर्श सजीव हो उठा। किसी आत्मीय व्यक्ति के जाने का दुःख केवल उसके भौतिक रूप से दूर हो जाने का नहीं होता, बल्कि उससे जुड़ी स्मृतियों, संवादों और प्रेरणाओं के बार-बार मन में उमड़ने का भी होता है।
विनोद जी भाई साहब के साथ मेरा संपर्क वर्ष 2008 में जबलपुर में हुआ था। उस समय वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मध्य क्षेत्र में क्षेत्रीय प्रचारक के दायित्व का निर्वहन कर रहे थे। मैं जबलपुर में निवास करता था। मेरा मूल स्थान उत्तर प्रदेश का महोबा है। बाल्यकाल से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आने और स्वयंसेवक के रूप में कार्य करने के कारण संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं तथा प्रचारकों के जीवन को निकट से समझने की मेरी स्वाभाविक जिज्ञासा रहती थी।
वर्ष 2008 की वह आत्मीय मुलाकात
वर्ष 2008 की एक स्मृति आज भी मेरे मन में ताजा है। विनोद जी भाई साहब के जबलपुर प्रवास के दौरान महानगर प्रचारक विक्रम जी भाई साहब उन्हें शाखा के उपरांत अल्पाहार के लिए मेरे घर लेकर आए। यह मेरे लिए सौभाग्य का अवसर था कि संघ के वरिष्ठ प्रचारक मेरे घर पधारे।
घर में सभी लोगों का परिचय हुआ। सामान्य घरेलू वातावरण में हुई उस भेंट ने आत्मीयता का ऐसा अनुभव कराया, जो समय बीतने के बाद भी स्मृतियों में सुरक्षित है। उस अवसर पर किसी औपचारिकता अथवा विशेष आयोजन का वातावरण नहीं था। सहज परिचय, सामान्य बातचीत और आत्मीयता से भरे व्यवहार के बीच विनोद जी भाई साहब को निकट से जानने का अवसर मिला।
मेरे लिए यह मुलाकात केवल एक वरिष्ठ प्रचारक से मिलने की घटना नहीं थी। यह उस जीवन-पद्धति को समझने का अवसर था, जिसमें व्यक्ति अपने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं से ऊपर उठकर किसी व्यापक ध्येय के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर देता है।
उनके व्यक्तित्व की पहली छाप गंभीरता और अनुशासन की थी। देखने में वे कुछ कठोर प्रतीत होते थे, लेकिन जब उनके साथ बैठने, बातचीत करने और उनके व्यवहार को समझने का अवसर मिलता, तो उस बाहरी गंभीरता के भीतर छिपी सहजता, आत्मीयता और सकारात्मक दृष्टिकोण का अनुभव होता था।
यही एक सच्चे कार्यकर्ता और तपस्वी प्रचारक के व्यक्तित्व की विशेषता होती है। वह अपने सिद्धांतों के प्रति दृढ़ रहता है, लेकिन व्यक्ति के प्रति आत्मीयता और व्यवहार में सहजता बनाए रखता है।
गंभीर व्यक्तित्व के भीतर आत्मीयता का संसार
किसी व्यक्ति को समझने के लिए केवल उसका बाहरी स्वरूप देखना पर्याप्त नहीं होता। उसके विचारों, व्यवहार और जीवन के उद्देश्य को समझना भी आवश्यक होता है। विनोद जी भाई साहब को निकट से देखने पर मुझे अनुभव हुआ कि उनकी गंभीरता के पीछे संगठन के प्रति गहरी प्रतिबद्धता और कार्य के प्रति उत्तरदायित्व का भाव था।
उनके व्यक्तित्व में अनुशासन था, लेकिन वह केवल औपचारिक अनुशासन नहीं था। वह स्वयं के जीवन को ध्येय के अनुरूप ढालने की साधना का परिणाम था। उनके व्यवहार में स्पष्टता थी और विचारों में सकारात्मकता। वे जिस कार्यपद्धति का प्रतिनिधित्व करते थे, उसमें व्यक्ति निर्माण, संगठन विस्तार और समाज के बीच निरंतर संपर्क का विशेष महत्व था।
संघ के प्रचारकों का जीवन सामान्य अर्थों में व्यक्तिगत उपलब्धियों की यात्रा नहीं होता। उनके जीवन की सार्थकता इस बात में होती है कि उन्होंने कितने लोगों को प्रेरित किया, कितने कार्यकर्ताओं को तैयार किया और समाज के बीच राष्ट्रभावना को मजबूत करने के लिए कितना समय दिया।
विनोद जी भाई साहब का जीवन भी इसी व्यापक ध्येय से जुड़ा हुआ था। हिंदुत्व, भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय चेतना और संगठन की मजबूती के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित किया। उनके जैसे प्रचारकों के जीवन को समझते हुए यह अनुभूति होती है कि किसी विचार के प्रति सच्ची निष्ठा केवल भाषणों और घोषणाओं से व्यक्त नहीं होती, बल्कि जीवन के प्रत्येक दिन को उस विचार के अनुरूप जीने से प्रकट होती है।
प्रचारक जीवन : व्यक्तिगत आकांक्षाओं से ऊपर राष्ट्रकार्य
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में प्रचारक का जीवन त्याग, अनुशासन, प्रवास और सतत संपर्क की साधना से जुड़ा होता है। प्रचारक अपने व्यक्तिगत जीवन की अनेक सामान्य आकांक्षाओं को पीछे छोड़कर समाज और संगठन के कार्य को प्राथमिकता देता है। उसका निवास बदलता रहता है, कार्यक्षेत्र बदलते रहते हैं और परिस्थितियां भी बदलती रहती हैं, लेकिन उसके जीवन का मूल ध्येय नहीं बदलता।
विनोद जी भाई साहब को क्षेत्रीय प्रचारक के दायित्व में कार्य करते हुए स्मरण करना इसी जीवन-साधना का स्मरण करना है। क्षेत्रीय स्तर पर संगठन के कार्य को गति देना, विभिन्न स्थानों के कार्यकर्ताओं से संपर्क रखना, उनकी समस्याओं और आवश्यकताओं को समझना तथा कार्य की दिशा को स्पष्ट बनाए रखना महत्वपूर्ण दायित्व होते हैं।
ऐसे दायित्वों के निर्वहन के लिए केवल प्रशासनिक क्षमता पर्याप्त नहीं होती। इसके लिए धैर्य, अनुभव, संवाद-कौशल, संगठनात्मक दृष्टि और कार्यकर्ताओं के प्रति आत्मीयता भी आवश्यक होती है।
प्रचारक का वास्तविक प्रभाव उसके पद से नहीं, बल्कि उसके संपर्क में आने वाले लोगों के जीवन में उत्पन्न सकारात्मक परिवर्तन से समझा जा सकता है। वह स्वयं आगे बढ़ने के बजाय दूसरों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। वह व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की अपेक्षा सामूहिक उपलब्धि को महत्व देता है। उसके लिए संगठन केवल कार्यकर्ताओं का समूह नहीं, बल्कि समान ध्येय से जुड़े लोगों का एक परिवार होता है।
विनोद जी भाई साहब की स्मृति मेरे लिए इसी जीवन-दृष्टि से जुड़ी हुई है।
जब स्मृतियां श्रद्धांजलि बन जाती हैं
वर्ष 2008 की उस मुलाकात को आज स्मरण करते हुए अनुभव होता है कि जीवन में कुछ क्षण समय की सीमाओं से आगे निकल जाते हैं। उस समय शायद यह अनुमान नहीं था कि वर्षों बाद वही मुलाकात इतनी आत्मीय स्मृति बनकर मन में उभरेगी।
जबलपुर में मेरे निवास पर उनका आगमन, विक्रम जी भाई साहब के साथ उनका आना, परिवार के सदस्यों से परिचय और उस सहज वातावरण में हुआ संवाद आज भी मेरे मन में सुरक्षित है। ये स्मृतियां किसी बड़े सार्वजनिक आयोजन अथवा औपचारिक कार्यक्रम से जुड़ी नहीं हैं, बल्कि सामान्य जीवन के उन क्षणों से जुड़ी हैं, जिनमें व्यक्ति का वास्तविक स्वभाव दिखाई देता है।
किसी व्यक्तित्व की महानता का अनुभव कई बार उसके बड़े वक्तव्यों से नहीं, बल्कि ऐसे छोटे-छोटे प्रसंगों से होता है। जब कोई व्यक्ति अपने दायित्व की गंभीरता के बावजूद सहज बना रहता है, दूसरों के साथ आत्मीयता से मिलता है और अपने व्यवहार से प्रेरणा देता है, तब उसके व्यक्तित्व की वास्तविक शक्ति सामने आती है।
विनोद जी भाई साहब के साथ हुई वह मुलाकात मेरे जीवन की ऐसी ही स्मृति है। आज उनके निधन का समाचार उस स्मृति को और अधिक भावुक बना देता है।
उनका जीवन स्वयं में एक संदेश है
आज के समय में, जब जीवन की सफलता को प्रायः पद, प्रतिष्ठा, संपत्ति और व्यक्तिगत उपलब्धियों के आधार पर मापा जाता है, तब विनोद जी भाई साहब जैसे प्रचारकों का जीवन हमें सफलता का एक व्यापक अर्थ समझाता है।
वास्तविक सफलता यह भी है कि व्यक्ति अपने जीवन को किसी ऐसे उद्देश्य के लिए समर्पित करे, जो उससे बड़ा हो। वह समाज के लिए जिए, अपने विचारों के प्रति ईमानदार रहे और अपने आचरण से दूसरों को प्रेरित करे।
हिंदुत्व और भारतीय संस्कृति के प्रति समर्पण का अर्थ केवल विचारों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि अपने जीवन में उन मूल्यों को धारण करना भी है, जिनमें कर्तव्य, सेवा, अनुशासन, त्याग और सामाजिक उत्तरदायित्व का भाव समाहित है।
विनोद जी भाई साहब का स्मरण करते हुए यह विचार स्वाभाविक रूप से सामने आता है कि संगठन की वास्तविक शक्ति उसके समर्पित कार्यकर्ताओं में होती है। भवन, व्यवस्थाएं और कार्यक्रम संगठन के बाहरी स्वरूप को प्रदर्शित करते हैं, लेकिन संगठन की आत्मा उन लोगों में निवास करती है, जो बिना किसी व्यक्तिगत अपेक्षा के उसके ध्येय के लिए कार्य करते हैं।
ऐसे व्यक्तित्वों का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता है। उनका योगदान केवल उनके जीवनकाल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनके संपर्क में आए कार्यकर्ताओं, उनके द्वारा प्रेरित व्यक्तियों और उनके कार्यों से आगे बढ़ने वाली परंपरा में जीवित रहता है।
एक आत्मीय स्मृति को नमन
मेरे लिए विनोद जी भाई साहब का स्मरण व्यक्तिगत अनुभूति से जुड़ा हुआ है। वर्ष 2008 में जबलपुर में मेरे घर पर हुई वह मुलाकात आज भी मेरे मानस में अंकित है। उनके व्यक्तित्व की गंभीरता, व्यवहार की सहजता और ध्येय के प्रति समर्पण की जो छाप उस समय बनी थी, वह आज भी स्मृतियों में जीवंत है।
महोबा की धरती से निकलकर जबलपुर में कार्य करने के दौरान संघ के अनेक कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ प्रचारकों से संपर्क का अवसर मिला। ऐसे संपर्कों ने संगठन, समाज और राष्ट्रकार्य के प्रति मेरी समझ को समृद्ध किया। विनोद जी भाई साहब के साथ हुई मुलाकात भी उसी अनुभव-यात्रा का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
आज उनके निधन पर मन श्रद्धा से नत है। शब्दों की अपनी सीमा होती है। कुछ भाव ऐसे होते हैं, जिन्हें पूरी तरह व्यक्त कर पाना संभव नहीं होता। किसी आत्मीय व्यक्ति के जाने पर उसकी स्मृतियां ही वह सेतु बन जाती हैं, जिसके माध्यम से हम उसके व्यक्तित्व और जीवन-मूल्यों से जुड़े रहते हैं।
विनोद जी भाई साहब का जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि व्यक्ति का वास्तविक परिचय उसके पद से नहीं, बल्कि उसके ध्येय, समर्पण और समाज के प्रति उसकी प्रतिबद्धता से होता है। शरीर नश्वर है, लेकिन विचारों के लिए जिया गया जीवन अपनी प्रेरणा के माध्यम से लंबे समय तक समाज में उपस्थित रहता है।
विनोद जी भाई साहब को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।
ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें। उनके जीवन से प्रेरणा प्राप्त करने वाले सभी स्वयंसेवकों और आत्मीयजनों को इस दुःख को सहन करने की शक्ति दें। उनका समर्पित जीवन, उनकी ध्येयनिष्ठा और उनकी स्मृतियां सदैव प्रेरणा देती रहें।
विनम्र श्रद्धांजलि एवं शत्-शत् नमन!