डॉ. भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार
भारतीय सनातन संस्कृति ने नारी को कभी केवल अबला या आश्रित नहीं माना। हमारी सांस्कृतिक चेतना में नारी शक्ति है, श्रद्धा है, करुणा है और आवश्यकता पड़ने पर रणचंडी भी है। यही कारण है कि हमारे शास्त्रों में कहा गया है-
«“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।”»
अर्थात जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवताओं का निवास माना जाता है।
भारतीय इतिहास में इस सनातन विचार को अपने जीवन और कर्म से साकार करने वाली अनेक महान नारियां हुईं। इन्हीं महान वीरांगनाओं की उज्ज्वल परंपरा में रानी दुर्गावती का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है।
5 अक्टूबर 1524 को कालिंजर में चंदेल वंश के राजपरिवार में जन्मी दुर्गावती बचपन से ही साहस, शौर्य और युद्धकौशल से संपन्न थीं। वे घुड़सवारी, धनुर्विद्या और शस्त्र संचालन में दक्ष थीं। आगे चलकर उनका विवाह गोंडवाना के राजा दलपत शाह से हुआ और वे गोंडवाना की रानी बनीं।
यह केवल दो राजवंशों का वैवाहिक संबंध नहीं था, बल्कि चंदेल और गोंड परंपराओं के ऐतिहासिक मिलन का भी प्रतीक था।
पति दलपत शाह के निधन के बाद जब उनका पुत्र वीर नारायण अल्पायु में था, तब रानी दुर्गावती ने शासन की बागडोर अपने हाथों में संभाली। उन्होंने यह सिद्ध किया कि नेतृत्व के लिए लिंग नहीं, साहस, क्षमता, दूरदृष्टि और राष्ट्रधर्म आवश्यक है।
नारी शक्ति का साक्षात स्वरूप
आज हम महिला सशक्तीकरण की बात करते हैं। लेकिन भारतीय इतिहास में सदियों पहले रानी दुर्गावती जैसी महिलाएं शासन, प्रशासन, युद्धनीति और लोककल्याण के क्षेत्र में अपना सामर्थ्य सिद्ध कर चुकी थीं।
उन्होंने यह प्रमाणित किया कि नारी पुरुष से प्रतिस्पर्धा करने के लिए नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर पुरुष के समान कंधे से कंधा मिलाकर राष्ट्र और समाज की रक्षा करने के लिए सक्षम है।
उनका जीवन उस सनातन विचार का सजीव उदाहरण है जिसमें नारी को शक्ति का स्वरूप माना गया है।
उनके लिए राजसत्ता भोग का माध्यम नहीं थी, बल्कि प्रजा की सेवा और मातृभूमि की रक्षा का दायित्व थी।
सुशासन और लोककल्याण की मिसाल
रानी दुर्गावती केवल रणभूमि की वीरांगना नहीं थीं। वे एक दूरदर्शी प्रशासक भी थीं।
उनके शासनकाल में जल-संरक्षण, कृषि, व्यापार, मार्ग और सार्वजनिक निर्माण पर विशेष ध्यान दिया गया। जबलपुर क्षेत्र में रानीताल, चेरीताल और आधारताल जैसे जलाशयों का निर्माण उनकी लोककल्याणकारी दृष्टि से जोड़ा जाता है।
इतिहास संबंधी स्रोत उनके शासनकाल को आर्थिक समृद्धि और सुव्यवस्थित प्रशासन से भी जोड़ते हैं। आकाशवाणी के ऐतिहासिक विवरण में अबुल फ़ज़ल के आइने-अकबरी के हवाले से गोंडवाना की समृद्धि का उल्लेख मिलता है।
अर्थात रानी दुर्गावती की वीरता केवल तलवार तक सीमित नहीं थी। उनकी वीरता में सुशासन, जल प्रबंधन, कृषि, व्यापार, प्रजा कल्याण और सांस्कृतिक संरक्षण भी शामिल था।
जब मातृभूमि पर संकट आया
रानी दुर्गावती के सामने सबसे बड़ी चुनौती तब आई जब मुगल सत्ता ने गोंडवाना पर अपना नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया।
आसफ खान के नेतृत्व में मुगल सेना ने गोंडवाना पर आक्रमण किया। संख्या और संसाधनों की दृष्टि से रानी की सेना कमजोर थी, लेकिन रानी दुर्गावती ने आत्मसमर्पण का रास्ता नहीं चुना। उन्होंने युद्धभूमि में स्वयं सेना का नेतृत्व किया और नर्रई क्षेत्र में मुगल सेना का सामना किया।
यह संघर्ष केवल एक राज्य और दूसरी सत्ता के बीच युद्ध नहीं था। यह स्वाभिमान बनाम अधीनता का संघर्ष था।
रानी दुर्गावती ने यह संदेश दिया कि
राज्य खोया जा सकता है, लेकिन स्वाभिमान नहीं।
जीवन समाप्त हो सकता है, लेकिन मातृभूमि के प्रति कर्तव्य समाप्त नहीं होता।
24 जून 1564 को नर्रई के युद्ध में उन्होंने वीरगति प्राप्त की। भारत सरकार के सांस्कृतिक स्रोत भी उन्हें मुगल साम्राज्य की शक्ति के सामने अदम्य साहस से खड़ी होने वाली वीरांगना और संस्कृति-सम्मान की प्रतीक के रूप में स्मरण करते हैं।
रानी दुर्गावती और सनातन संस्कृति
रानी दुर्गावती का जीवन हमें यह समझाता है कि सनातन संस्कृति केवल पूजा-पद्धति का नाम नहीं है।
सनातन का अर्थ है
कर्तव्य, करुणा, शौर्य, सत्य, स्वाभिमान, लोककल्याण और मातृभूमि के प्रति समर्पण।
रानी दुर्गावती ने इन सभी मूल्यों को अपने जीवन में उतारा।
वे मंदिरों और लोकपरंपराओं के संरक्षण से लेकर जलाशयों के निर्माण और प्रजा के हित तक, शासन के प्रत्येक क्षेत्र में सक्रिय रहीं। उनके जीवन में शक्ति और ममता, शस्त्र और शास्त्र, शासन और सेवा का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
देवी सूक्त में नारी शक्ति का जो विराट स्वरूप व्यक्त होता है-
«“अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चरामि...”»
अर्थात मैं ही रुद्रों और वसुओं के साथ विचरण करने वाली शक्ति हूं-
रानी दुर्गावती का जीवन उस शक्ति की ऐतिहासिक अभिव्यक्ति जैसा प्रतीत होता है।
आज की युवा पीढ़ी के लिए संदेश
आज जब हमारी युवा पीढ़ी आधुनिकता, तकनीक और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में आगे बढ़ रही है, तब रानी दुर्गावती का जीवन उसके सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न रखता है-
क्या आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों को भूल जाना है?
उत्तर स्पष्ट है-नहीं।
आधुनिक भारत को तकनीक में आगे बढ़ना है, आर्थिक रूप से शक्तिशाली बनना है, विश्व में नेतृत्व करना है; लेकिन इसके साथ उसे अपनी सांस्कृतिक स्मृति, इतिहास और महान परंपराओं से भी जुड़ा रहना होगा।
रानी दुर्गावती युवाओं को सिखाती हैं कि-
साहस रखो।
कर्तव्य निभाओ।
अन्याय के सामने झुको मत।
मातृभूमि का सम्मान करो।
और अपने इतिहास को जानो।
रानी दुर्गावती केवल गोंडवाना की रानी नहीं
रानी दुर्गावती को किसी एक समाज, जाति या क्षेत्र की सीमा में बांधना उनके विराट व्यक्तित्व को छोटा करना होगा।
वे चंदेल परंपरा की पुत्री थीं, गोंडवाना की रानी थीं और संपूर्ण भारत की वीरांगना हैं।
उनकी विरासत में आदिवासी गौरव भी है, भारतीय नारी शक्ति भी है, सनातन सांस्कृतिक चेतना भी है और राष्ट्ररक्षा का अदम्य संकल्प भी है।
इसलिए रानी दुर्गावती की जयंती केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र निर्माण का अवसर है।
आज आवश्यकता है कि विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं और युवा संगठनों में रानी दुर्गावती के जीवन पर चर्चा हो। नई पीढ़ी को बताया जाए कि भारत की बेटियां केवल इतिहास की दर्शक नहीं रही हैं; उन्होंने इतिहास बनाया है।
इतिहास को मिटाने नहीं, समझने की आवश्यकता
समय बदलता है, राजनीतिक विचारधाराएं बदलती हैं और इतिहास को देखने के दृष्टिकोण भी बदलते हैं। लेकिन राष्ट्र अपने महान नायकों और नायिकाओं की स्मृति से शक्ति प्राप्त करता है।
रानी दुर्गावती की गाथा हमें बताती है कि अपनी सांस्कृतिक पहचान, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए संघर्ष करना भारतीय परंपरा का अभिन्न हिस्सा रहा है।
इसलिए आज आवश्यकता किसी के प्रति घृणा पैदा करने की नहीं, बल्कि अपने गौरवशाली इतिहास को सही संदर्भ में समझने की है।
रानी दुर्गावती के जीवन का सबसे बड़ा संदेश यही है-
शक्ति केवल हाथ में उठी तलवार में नहीं होती;
शक्ति उस संकल्प में होती है जो अन्याय के सामने झुकने से इनकार करता है।
आज 5 अक्टूबर को जब हम इस महान वीरांगना की जयंती मनाएं, तो केवल उनकी प्रतिमा पर पुष्प अर्पित न करें।
उनके जीवन से प्रेरणा लें।
बेटियों को शिक्षा दें।
युवाओं में राष्ट्रभाव जगाएं।
जल, जंगल और जमीन के संरक्षण को महत्व दें।
प्रजा और समाज के प्रति अपने कर्तव्य को समझें।
और सबसे बढ़कर-स्वाभिमान के साथ भारत की सनातन सांस्कृतिक चेतना को आगे बढ़ाएं।
क्योंकि रानी दुर्गावती का जीवन हमें पुकारकर कहता है-
«“मातृभूमि की रक्षा में जो जीवन समर्पित हो जाए,
वही जीवन इतिहास में अमर हो जाए।”»
रानी दुर्गावती की वीरता को शत्-शत् नमन।
उनके स्वाभिमान को नमन।
उनके राष्ट्रधर्म को नमन।
उनकी अमर मातृशक्ति को नमन।