गाँधी जी, संघ और पंच परिवर्तन

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    02-Oct-2026
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गाँधी जी, संघ और पंच परिवर्तन
 
 
 
अखिलेश श्रीवास्तव
वरिष्ठ पत्रकार
 
 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और महात्मा गांधी देश में स्थाई चर्चा के विषय है. अलग-अलग भी और दोनों को जोड़कर भी. पर प्रमाण बताते है कि संघ और गाँधी जी एक दूसरे के शुभचिंतक थे. संघ महात्मा गाँधी का कितना सम्मान करता था आप इस बात से समझ सकते है कि प्रति दिन सुबह पाठ किये जाने वाले एकात्मता स्त्रोत में गाँधी जी का नाम सम्मान से प्रतिदिन दोहराया जाता है वह भी साठ के दशक से और 1948 में उनकी मृत्यु पर शोक व्यक्त करने के लिए पहली बार सभी शाखाएं बंद कर दी गई थीं, जबकि संघ में उसके बाद किसी भी परिस्थिति में आज तक ऐसा नहीं हुआ.
 
महात्मा गांधी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच न केवल सौहार्दपूर्ण संबंध थे, बल्कि वे एक-दूसरे का सम्मान भी करते थे ।
 
गांधी ने 1934 में महाराष्ट्र के वर्धा में आरएसएस के शिविर का दौरा करते समय आरएसएस की जमकर प्रशंसा की थी । बाद में, उन्होंने 16 सितंबर 1947 को दिल्ली में सफाईकर्मियों की बस्ती में संघ के एक कार्यक्रम को संबोधित किया।
 
इस संबंध में एक रिपोर्ट 28 सितंबर 1947 को गांधीजी द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक समाचार पत्र 'हरिजन' में प्रकाशित हुई ।
 
रिपोर्ट में “गांधी जी ने बताया कि संस्थापक श्री हेडगेवार के जीवित रहते हुए उन्होंने वर्षों पहले वर्धा स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिविर का दौरा किया था। स्वर्गीय श्री जमनालाल बजाज उन्हें शिविर में ले गए थे और गांधी जी वहां के अनुशासन, छुआछूत के पूर्ण अभाव और कठोर सादगी से बहुत प्रभावित हुए थे।” गांधीजी को विश्वास था कि सेवा और आत्म-बलिदान के आदर्श से प्रेरित कोई भी संगठन बलवान होगा।
 
आज जब हम गांधी जी की 157 वीं जयंती मना रहे हैं और हम 2026 में है। एक ऐसा व्यक्ति जो आज से 157 साल पहले पैदा हुआ और उसने समाज और देश को जो विचार दिए वह आज उनके जाने के लगभग 78 साल बाद भी जीवित है। उन्होंने जो कुछ कहा वह देश को जैसा बनना चाहते थे और आज देश जैसा बन गया है. उसमें एक बहुत बड़ा अंतर है जिसके बारे में सोचने समझने की आवश्यकता है। आखिर गांधी के सपनों का भारत कैसा था ? जिन्होंने भारत को बनाया उन्होंने भारत को गांधी के सपनों का भारत बनाया या गांधी के सपनों की कीमत पर भारत बनाया। आज समाज में दो ही बातें चल रहे हैं एक गांधी की बातों को मानने की और दूसरी गांधी की बातों को झूठ लाने की। यह दोनों काम ही आसान नहीं है पर जब हम दृष्टि डालेंगे तो हमको पता चलेगा कि कौन गांधी के विचारों को अपनाने की बात कर रहा है और कौन केवल गांधी के बारे में बात कर रहा है। महात्मा गांधी केवल एक व्यक्ति नहीं थे, महात्मा गांधी एक विचार थे, एक विचारों की श्रृंखला थे। गांधी एक दर्शन है। उन्होंने अपने जीवन में भी वह कर दिखाया है और वैसा ही वह देश में कर दिखाना चाहते थे और वैसा ही देश को बनाना चाहते थे गांधी का जो राम राज्य है वह एक आदर्श राज्य की स्थापना की बात करता है उसमें स्वदेशी है स्वावलंबन है गांधी के सपनों का भारत आत्म निर्भर भारत है.।
 
गाँधी जी का स्वदेशी, ग्राम स्वराज, असप्रस्यता और आत्मनिर्भरता का विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा चलाए जा रहे 'पंच परिवर्तन' से समाज परिवर्तन के अभियान से पृथक नहीं है।
 
आज जब देश अपनी स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ रहा है, तब यह विचार करना अत्यंत प्रासंगिक है कि हमने 'स्वराज' की प्राप्ति तो राजनीतिक रूप से कर लीं है ,अब हमको स्व आधारित तंत्र का निर्माण करना है यही गाँधी जी चाहते थे. जो समाज के भीतर से आने वाले वैचारिक और व्यावहारिक बदलाव से ही संभव है। महात्मा गाँधी का संपूर्ण जीवन-दर्शन भारत को उसकी जड़ों से जोड़कर आत्मनिर्भर बनाने का एक महायज्ञ था। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यदि देखा जाये तो गाँधी जी का विचार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 'पंच परिवर्तन' के माध्यम से ही ज़मीन पर उतारा जा सकता है।
 
 
यदि हम महात्मा गाँधी के स्वदेशी और ग्राम स्वराज की बात करें तो यह गाँधी जी का आर्थिक अधिष्ठान था।
 
 
गाँधी जी का स्पष्ट मानना था कि भारत की आत्मा उसके सात लाख गाँवों में बसती है। जब तक देश का प्रत्येक गाँव आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक रूप से आत्मनिर्भर और समर्थ नहीं होगा, तब तक हम 'सच्चा स्वराज' प्राप्त नहीं कर सकते। 14 फरवरी 1916 को मद्रास के एक भाषण में उन्होंने स्वदेशी को परिभाषित करते हुए कहा था, "स्वदेशी वह भावना है जो हमें अपने दूर के वातावरण को छोड़कर अपने निकटतम वातावरण का ही उपयोग और सेवा करना सिखाती है।" जिसका प्रामाणिक दस्तावेज़ 'द कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गाँधी' यानी गाँधी वांग्मय के खंड 13, पृष्ठ 219 पर सुरक्षित है.
 
गाँधी जी का आर्थिक दर्शन केंद्रीकृत पूंजीवाद और मशीनीकरण के उस रूप के खिलाफ था जो इंसानों को बेकार कर देता है। गाँधी वांग्मय के खंड 42 के अनुसार, वे चाहते थे कि उत्पादन कुछ बड़े औद्योगिक घरानों के हाथों में सिमटने के बजाय आम जनता द्वारा अपने स्थानीय स्तर पर किया जाए। इसी तरह, 26 जुलाई 1942 को अपनी पत्रिका 'हरिजन' में लिखे एक ऐतिहासिक लेख में, जो आज गाँधी वांग्मय के खंड 76, पृष्ठ 308-309 पर संकलित है, उन्होंने ग्राम स्वराज की अपनी अमर परिकल्पना को साझा करते हुए लिखा था, "ग्राम स्वराज की मेरी कल्पना यह है कि वह एक ऐसा पूर्ण प्रजातंत्र होगा जो अपनी अहम जरूरतों—जैसे अन्न और वस्त्र—के लिए अपने पड़ोसी पर निर्भर नहीं करेगा... और फिर भी दूसरी बहुत-सी जरूरतों के लिए, जिनमें एक-दूसरे का सहयोग अनिवार्य है, वह परस्पर सहयोग से काम लेगा।"
 
संघ के स्वदेशी का जो विचार है वह भी यही कहता है " थिंक ग्लोबली बट एक्ट लोकली " सोचना वैश्विक स्तर से है पर क्रियान्वयन स्थानीय।
 
'पंच परिवर्तन' और गाँधी के सपनों का भारत एक दूसरे के पूरक है।
 
गाँधी जी के वैचारिक अधिष्ठान को आज के बदलते वैश्विक परिदृश्य में व्यावहारिक धरातल पर क्रियान्वित करने का काम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने 'पंच परिवर्तन' के संकल्प से कर रहा है। संघ के पूजनीय सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के नेतृत्व में समाज के सामूहिक प्रयास से जिन पांच आयामों पर काम किया जा रहा है, वे सीधे तौर पर गाँधी जी के रामराज्य और आत्मनिर्भर समाज की अवधारणा को पुष्ट करते हैं:
 
संघ का जो 'स्वदेशी' का आग्रह है वह ठीक गाँधी जी के आर्थिक विज़न से मेल खाता है। इसका अर्थ केवल विदेशी वस्तुओं का त्याग नहीं, बल्कि देश के भीतर निर्मित सामग्रियों को प्राथमिकता देना, स्थानीय निर्माण को बढ़ावा देना और ग्रामीण कारीगरों को आत्मनिर्भर बनाना है। जे. सी. कुमारप्पा ने अपनी कालजयी पुस्तक 'इकनॉमी ऑफ परमानेंस' (स्थायी अर्थव्यवस्था, 1945) में जिस 'सेवा की अर्थव्यवस्था' की वकालत की थी, संघ उसी स्वदेशी भावना को आज के युवाओं के दैनिक आचरण और उपभोक्ता व्यवहार में ढालने का प्रयास कर रहा है।
 
फिर पर्यावरण है जिसमें सद्भाव और सादगी पर जोर है. प्रकृति का शोषण नही दोहन, उसके साथ संतुलन बनाकर जीना गाँधीवादी जीवन-शैली का मुख्य अंग था। बापू कहते थे कि प्रकृति के पास हमारी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए सब कुछ है, लेकिन लालच के लिए नहीं। पंच परिवर्तन का दूसरा स्तंभ पर्यावरण संरक्षण - जल संरक्षण, प्लास्टिक मुक्ति और वृक्षारोपण इसी विचार को आगे बढ़ाता है।
 
गाँधी जी के लिए परिवार ही समाज और राष्ट्र की प्राथमिक इकाई था। कुटुंब प्रबोधन के माध्यम से संघ परिवारों में आपसी संवाद, बुजुर्गों के प्रति सम्मान और नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति व नैतिक मूल्यों से जोड़ने का कार्य कर रहा है। यह एक ऐसे समाज की नींव रखता है जो बाहर से अनुशासित होने के बजाय भीतर से संस्कारित हो।
 
सामाजिक समरसता यानि भेदभाव का अंत गाँधी जी ने आजीवन छुआछूत और जातिवाद के खिलाफ संघर्ष किया। संघ का 'सामाजिक समरसता' का आयाम समाज के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति को गले लगाने और 'एक कुआँ, एक मंदिर, एक श्मशान' के सिद्धांत पर काम करते हुए समाज को जातिगत ऊंच-नीच से मुक्त करने का संकल्प है। रामजी मिश्र ने अपनी पुस्तक 'गाँधी का आर्थिक दर्शन' में लिखा था कि जब तक समाज में सामाजिक न्याय और समरसता नहीं होगी, तब तक ग्राम स्वराज की कल्पना अधूरी है।
 
नागरिक कर्तव्य की बात करें तो गाँधी जी अधिकारों से अधिक कर्तव्यों पर बल देते थे। संघ का पांचवां आयाम 'नागरिक कर्तव्य' है, जो प्रत्येक व्यक्ति को केवल अधिकार केंद्रित न होकर राष्ट्र के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों जैसे कानून का पालन, स्वच्छता, समयबद्धता और सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा के प्रति सजग बनाता है।
 
पंच परिवर्तन
समाज परिवर्तन का जन-आंदोलन बने.
 
गाँधी जी की तरह ही संघ का भी यह दृढ़ मत है कि कोई भी बड़ा परिवर्तन केवल सरकारी कानूनों या सरकारी योजनाओं के भरोसे नहीं आ सकता। जब तक समाज स्वयं जागृत होकर अपने आचरण में बदलाव नहीं लाएगा, तब तक देश आत्मनिर्भर नहीं बन सकता। आधुनिक संदर्भों में शोधकर्ता पीयूष कुमार पांडेय ने अपने शोध पत्र "गाँधीजी एंड ग्राम स्वराज" में रेखांकित किया है कि ग्रामीण विकास और ज़मीनी स्तर के बदलावों के लिए सामाजिक संगठनों की सक्रियता अनिवार्य है।
 
संघ का 'पंच परिवर्तन' वास्तव में सरकारी तंत्र पर निर्भरता कम करके 'स्व' के बोध को जगाने का एक जन-आंदोलन है। यह राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने और नागरिक चेतना को जगाने का एक अनूठा प्रयोग है, जहाँ हर व्यक्ति अपनी दैनिक जीवन-शैली को देशहित के अनुकूल ढालने का व्रत लेता है।
 
 
आज वैश्विक स्तर पर बढ़ते पर्यावरण संकट और सामाजिक ताने-बाने के बिखरने के इस दौर में हमें यह स्वीकार करना होगा कि पश्चिमी उपभोगवादी मॉडल भारत का भला नहीं कर सकता। हमें अपनी जड़ों की ओर लौटना ही होगा।
 
महात्मा गाँधी ने आज से कई दशक पहले जिस आत्मनिर्भर और स्वावलंबी भारत का रोडमैप तैयार किया था, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का 'पंच परिवर्तन' संकल्प उसी विज़न का 21वीं सदी का व्यावहारिक संस्करण है। जब देश का प्रत्येक नागरिक स्वदेशी को अपनाएगा, पर्यावरण की रक्षा करेगा, अपने परिवार को संस्कारित करेगा, सामाजिक समरसता को जिएगा और अपने नागरिक कर्तव्यों का पालन करेगा, तभी बापू के सपनों का ग्राम स्वराज और 'सच्चा आत्मनिर्भर भारत' साकार हो सकेगा।
 
अख़बारों की सुर्खियों और बहसों से परे, समाज के धरातल पर चुपचाप चल रहा यह वैचारिक और व्यावहारिक परिवर्तन ही आने वाले समय में देश के स्वर्णिम भविष्य को लिखेगा।