शुभानन मधुसूदन खेमरिया
युवा लेखक एवं स्तंभकार
“विजयदशमी केवल एक पौराणिक विजय का संस्मरण नहीं, अपितु केशव के बीज-संकल्प और माधव के अखिल भारतीय विस्तार से उद्भूत वह नवचैतन्य है, जिसने बँटी हुई अस्मिता को अजेय संगठन में रूपांतरित कर दिया।”
संघ-स्थान के वटवृक्ष की छाँव में जब साँझ ढलती है और संचलन के सधे हुए चरणों की ताल पर स्वयंसेवकों के कंठ से यह स्वर गूँजता है-‘पूर्ण विजय संकल्प हमारा, अनथक अविरल साधना’—तो यह मात्र कंठस्थ की गई कोई पंक्ति नहीं रह जाती। यह उस अंतःचेतना का कंपन है, जो एक साधारण शाखा के मैदान से उठकर समूचे राष्ट्र-पुरुष की धमनियों में प्राण-रस बनकर बहने लगती है।
एकात्मता स्तोत्र में हम नित्य स्मरण करते हैं-
‘संघशक्ति-प्रणेतारौ केशवो माधवस्तथा। स्मरणीयाः सदा ह्येते नवचैतन्यदायकाः॥’
जब हम विजयदशमी के पावन पर्व पर विचार करते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि यह तिथि केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि इस ‘संघ-शक्ति’ के प्राकट्य और उसके दोनों प्रणेताओं की तपस्या का साक्षात्कार है। यह नवचैतन्य सहस्राब्दियों के आघातों, औपनिवेशिक दासता और आंतरिक विखंडन से क्लांत समाज को उसकी अपनी सुप्त आत्मशक्ति का पुनः स्मरण कराने का अनुष्ठान था।
शास्त्र, शस्त्र और धर्म-विजय का सनातन तत्त्व
भारतीय काल-गणना में विजयदशमी केवल रावण-दहन का लोक-कौतुक नहीं, बल्कि सनातन भारत के सामर्थ्य और धर्म-विजय का अधिष्ठान है। हमारे शास्त्रों का शाश्वत उद्घोष है—‘यतो धर्मस्ततो जयः।’ त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने जब लंका पर विजय प्राप्त की, तो वह किसी साम्राज्य-विस्तार की लालसा नहीं थी; वह समाज के अंतिम पायदान पर खड़े केवट, वनवासी, शबरी और रीछ-वानरों को एक सूत्र में पिरोकर धर्म-संस्थापना का महायज्ञ था।
दुर्गासप्तशती में महिषासुर के त्रास से मुक्ति हेतु समस्त देवों ने अपने तेज का एकत्रीकरण किया, जिससे महाशक्ति जगदम्बा महिषासुरमर्दिनी के रूप में प्रकट हुईं। यह शास्त्रीय प्रमाण है कि बिखरी हुई शक्तियाँ पराजय का कारण बनती हैं और संगठित शक्ति विजय का सृजन करती है। अज्ञातवास की समाप्ति पर शमी वृक्ष से गांडीव उतारकर किया गया शस्त्र-पूजन भी यही सिखाता है कि शक्तिहीन सत्य केवल सैद्धांतिक विलाप है, जब तक कि उसके पृष्ठभाग में संगठित शौर्य का अधिष्ठान न हो।
केशव का बीज-संकल्प: विजयदशमी ही क्यों?
27 सितंबर 1925 को आद्य सरसंघचालक पूज्य डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने संघ की नींव रखने के लिए विजयदशमी का ही दिन क्यों चुना? डॉक्टर साहब ने स्वतंत्रता संग्राम की क्रांतिकारी अग्नि से लेकर सत्याग्रह तक को निकट से जिया था। वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि भारत वीरों या दर्शन की कमी से पराधीन नहीं हुआ; भारत पराजित हुआ अपने आंतरिक बिखराव और जातिगत संकीर्णताओं से।
डॉक्टर जी ने विजयदशमी को चुना, क्योंकि यह दिन संकीर्ण परिधियों को लाँघकर संगठित पराक्रम का वरण करने का दिन है।
साधना, संगठन एवं राष्ट्र-जागरण
मोहिते के बाड़े में बिना किसी औपचारिक घोषणापत्र के, केवल कुछ बालकों को एकत्र कर उन्होंने दैनिक शाखा का बीजारोपण किया। यदि डॉक्टर साहब ने इस शक्ति का बीजारोपण किया, तो द्वितीय सरसंघचालक पूज्य माधव सदाशिवराव गोलवलकर (श्रीगुरुजी) ने उस बीज को अपनी अविरल साधना से सिंचित कर एक विशाल वटवृक्ष का आकार दिया।
श्रीगुरुजी ने विचार-दर्शन की सुदृढ़ पीठिका प्रदान की और संघ को प्रत्येक प्रांत, भाषा और वन-कंदराओं तक पहुँचाया। संघ-प्रार्थना का सूत्र-
‘विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्, विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्’
दोनों प्रणेताओं की इसी युगल साधना का प्रत्यक्ष फल है। शाखा केवल व्यायाम का स्थल नहीं, अपितु राष्ट्र-देवता की नित्य आराधना का अनुष्ठान बन गई।
रेशिमबाग का मंच: राष्ट्रीय विमर्श और लोक-जागरण
नागपुर के रेशिमबाग मैदान में आयोजित होने वाला विजयदशमी उत्सव भारत के नीतिगत और सांस्कृतिक पुनरुत्थान का प्रकाश-स्तंभ है। आज जब वैचारिक विमर्श (Narrative Warfare) सीमाओं के युद्ध से भी अधिक सघन हो चुका है, तब नागपुर के इस ऐतिहासिक मंच से राष्ट्रीय पत्रकारिता के शीर्ष संवाहकों और प्रबुद्ध विचारकों का जुड़ना एक युगांतरकारी संदेश देता है।
जब समाज की प्रबुद्ध बौद्धिक दृष्टि और संघ की ज़मीनी साधना एक धरातल पर आकर संवाद करती हैं, तो यह सिद्ध होता है कि राष्ट्र-निर्माण केवल किसी एक संगठन का कार्य नहीं, बल्कि समूचे समाज का सामूहिक अनुष्ठान है।
अमृतकाल में ‘उत्तिष्ठ भारत’
आज जब भारत अपनी औपनिवेशिक हीनभावना को त्यागकर ‘विकसित भारत’ के संकल्प के साथ खड़ा है, तब समाज को बाँटने के षड्यंत्र भी अधिक सूक्ष्म हो चुके हैं। विजयदशमी हमें स्मरण कराती है कि जब तक समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के भीतर यह स्वाभिमान जाग्रत न हो जाए कि ‘यह राष्ट्र मेरा है और मैं इस राष्ट्र का हूँ’, तब तक यह साधना अविरल चलेगी।
अंधकार कितना भी सघन हो, यदि निष्ठा अडिग है, चरण तालबद्ध हैं और संकल्प अविरल है, तो भारत का जगद्गुरु के पद पर पुनः प्रतिष्ठापित होना सुनिश्चित है।
‘परम वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रम्।’
श्रद्धा सहित किए गए कार्यों से ही विजय का मार्ग प्रशस्त होता है। केशव के बीज-संकल्प और माधव की अविरल साधना का यही संदेश है-राष्ट्र-निर्माण कोई क्षणिक अभियान नहीं, बल्कि पीढ़ियों तक चलने वाली तपस्या है।
अंधकार कितना भी सघन हो, यदि निष्ठा अडिग है, तो भारत का जगद्गुरु बनना सुनिश्चित है।