कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल
(साहित्यकार, स्तंभकार एवं पत्रकार)
बांग्लादेश में हिंदुओं का नर-संहार करने वाले भी भारत में हो रही SIR प्रक्रिया के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं। किसान आंदोलन के समय टूलकिट गैंग का हिस्सा रही तथाकथित पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग-SFI के साथ लंदन में भारत के चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट कर रही हैं। क्या कांग्रेस-कॉकरोचेस के इस ग्लोबल इकोसिस्टम को समझना इतना मुश्किल है? बाक़ी तो छोड़िए, बांग्लादेश में कॉकरोचेस के समर्थन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ में इ-स्ला'मिक कट्टरपंथी नारे लगा रहे हैं।
• गज़ब की क्रोनोलॉजी है न?
भइया, भारत और भारत की सांविधानिक संस्थाओं के ख़िलाफ़ ग्लोबल सपोर्ट सिस्टम हो, तो अइसा | ज्ञानेश कुमार इस्तीफ़ा दो, आख़िर तुम 'बां-ग्लादेशियों' के नाम कैसे का-ट सकते हो?
आइए समझते हैं क्रोनोलॉजी :
• प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शब्दों में 'माओवादी मुस्लिम लीगी कांग्रेस' का इकोसिस्टम-मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े को लेकर उतरते हैं।
•सीजेपी के आशुतोष रांका, सौरव दास, अभिजीत दीपके, जर्मनी में रहने वाले ध्रुव राठी, वामपंथी छात्र संगठन AISAकी अध्यक्ष नेहा बोरा— ये सब पुलिस-प्रशासन की अनुमति के बिना अराजकता के लिए आते हैं। इसके बाद, कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस अराजकता फैलाने वालों को डिटेन करती है। हालांकि मोदी विरोधी वार्ड के - अभिनेता प्रकाश राज, ध्रुव राठी, सौरव दास, अभिजीत दीपके, Alt News वाले तथाकथित फैक्टचेकर मोहम्मद ज़ुबैर समेत इनके सभी कार्यकर्ता कुछ दिन पहले ही बेंगलुरु में एकजुट होते हैं। वहां कांग्रेस सरकार का सेफ जोन के बावजूद फ्लाप शो होता है। इसके बावजूद, ये पूरा इकोसिस्टम -10 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ प्रदर्शन की चेतावनी देते हैं। जैसे ये कोई डिक्टेटर हैं, जो देश म इनके हिसाब से सब चलेगा।
तिस पर चतुराई देखिए कि - ये तिलचट्टे फ्लाइट में बैठने से लेकर, पल-पल की ख़बर देते हैं। ताकि इन्हें डिटेन कर लिया जाए। क्योंकि इन्हें सेफ जोन में रहकर विक्टिम कार्ड खेलना है। वो इसलिए - क्योंकि जंतर-मंतर में अगर धोखे से अराजकता उत्पन्न हो तो लाठियां इन पर ना पड़ें। बकायदे भगवा गमछा पहनकर इनके कार्यकर्ता जंतर-मंतर में आए।
ताकि उकसावे के ज़रिए कुछ अप्रिय घटना कराई जाए। भगवा, RSS -बजरंगदल और हिंदू संगठनों को बदनाम किया जाए। ये सब इन्होंने करने में छुटपुट सफलता भी पाई।
इतना ही नहीं, इसके बाद देशद्रोह, हत्या, दंगों जैसे गंभीर आरोपों में जेल में बंद उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे आरोपियों की रिहाई के पोस्टर लहराए गए।यानी नाम कुछ और काम कुछ। गुरुद्वारा बंगला साहिब में इसको लेकर इंतज़ामात कर, गुरुघर की पवित्रता के साथ खिलवाड़ करने की साज़िश की गई।यानी जो गुरुघर ईश्वर की श्रद्धा का केंद्र था। वहां से अराजक तत्वों ने अपनी सियासी ज़मीन तलाशने की कोशिश की।
•फिर क्या होता है? अब इस इकोसिस्टम द्वारा फंडेड उनके कार्यकर्ता, पत्रकार के भेष में पार्टी लाइन में कवरेज़ करने जुटते हैं। पुलिस और वहां लोगों को उकसाते हैं। विक्टिम दिखने वाले एंगल से रील्स का इंतज़ाम किया जाता है।वो बताते हैं कि “अजी ! हमें डिटेन किया जा रहा है। अघोषित इमरजेंसी लगी हुई है।” भगवा, RSS और हिंदू संगठनों को टारगेट किया जाता है। ताकि इनके ग्लोबल नेटवर्क के लोग सारी दुनिया के सामने चीख-चीख कर ये कह सकें कि - देखो-देखो भारत में लोकतंत्र ख़तरे में है। इनकी ये स्क्रिप्ट भी काम आई। हुआ भी यही।
•फिर बां'ग्लादेश में हिंदुओं के नर-संहार, पीओके, बलूचिस्तान, 'चीन' समेत सारी दुनिया में ख़ामोशी ओढ़े रहने वाला यूनाइटेड नेशन अचानक जागता है। भारत में मानवाधिकार को लेकर अपना ज़हर उगलता है। भारत को मानवाधिकार का पाठ पढ़ाने की नाकाम कोशिश करता है। ग्लोबल मीडिया भारत को लेकर अपने वही पुराने नैरेटिव को सेट करता नज़र आया। भारत में लोकतंत्र, मोदी की छवि पर डेंट, चुनौती जैसे पुराने एजेंडे ख़ूब चलाए गए। ये क्रम अभी भी जारी है। क्योंकि भारत विरोध उनका स्थायी कार्य है।
•इसके ठीक बाद 11 अक्टूबर 2026 को इन सबके मुख्य कर्ताधर्ता राहुल गांधी- सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत के द्वारा मिलने से मना करने पर भी सुप्रीम कोर्ट में मार्च करने का ऐलान करते हैं। सुप्रीम कोर्ट उन्हें चिट्ठी लिखकर समझाता है कि - राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे आप याचिका लगाकर सुप्रीम आइए। जो देश की सांविधानिक प्रक्रिया है।आपकी सभी बातें सुनी जाएंगी। क्योंकि हम अपने क्षेत्राधिकार से बाहर नहीं जाएंगे।
• लेकिन नहीं...! माओ की रेड बुक की तर्ज़ पर संविधान लिखी बुकलेट लहराने वाले राहुल गांधी सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च पर निकल जाते हैं। सभी सांविधानिक संस्थाओं को धमकी देते हैं। वो ये कहते हैं कि - हम सबको देख लेंगे! 12 अक्टूबर 2026 को पूरे रास्ते राहुल गांधी धक्का-मुक्की करते हुए जाते हैं। अपने बुलाए यूट्यूबर्स और कार्यकर्ताओं तक को अपने रास्ते से धक्का देते हुए भगाते हैं। कांग्रेस की केरल ईकाई 12 अक्टूबर 2026 शाम 4:48 मिनट पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को धमकी देते हुए एक्स पोस्ट करती है। केरल कांग्रेस ने एक्स पोस्ट में लिखा - “Dear Surya Kant,If law and order is not your domain, resign now. We will find your replacement who can handle it.”
जैसे देश और सांविधानिक संस्थाएं इनकी बपौती हों ? ये सबके मालिक हैं और इनके हिसाब से अगर सांविधानिक संस्थाएं कार्य नहीं करेंगी तो ये सबको धमकाएंगे। कुछ हजा़र की उन्मादी भीड़ लेकर सड़कों पर उतरेंगे। देश की सांविधानिक संस्थाओं को अपमानित करेंगे। सबको धमकी देंगे। गज़ब की राजनीति है न ?
यानी इनका - सारा तरीक़ा और काम अलोकतांत्रिक। हर ओर इनकी मनमर्ज़ी चलेगी। क्यों भई क्यों? क्या ये देश किसी राहुल गांधी का ग़ुलाम है ? क्या ये देश अराजक भीड़ का गुलाम है? आपकी जो आपत्तियां हों, आरोप हों। उन्हें लेकर संविधान सम्मत ढंग से विरोध कीजिए। लेकिन नहीं ये उद्देश्य ही नहीं है। सो, हल कहां मिलेगा?
•यानी कांग्रेस के इस इकोसिस्टम को लगता है कि ये देश में अराजकता फैलाकर - सांविधानिक संस्थाओं और निर्वाचित सरकार को गिरा सकते हैं।इनकी नज़र में - चुनाव आयोग, ED,CBI, पुलिस, प्रशासन, मीडिया सब ग़लत हैं। सही केवल राहुल गांधी और उनकी अराजक गैंग है? क्योंकि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के ज़माने से इन्हें ये लगता है कि ये कभी भी देश को बंधक बना सकते हैं। आपातकाल लागू कर - लोकतंत्र और संविधान की ह'त्या कर सकते हैं। इनकी पीड़ा ये है कि - सत्ता को अपनी जागीर समझने वालों को जनता आख़िर क्यों नहीं चुन रही है? राहुल गांधी के हिस्से वैसे भी 99 चुनाव हरवाने का रिकॉर्ड है। फिर देश के अलग-अलग हिस्सों में हालिया हुए उपचुनावों में करारी शिकस्त। ये कैसे पच सकती है?
• ऊपर से इनके प्रमुख सहयोगी योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण के 'रिजीम चेंज' करने वाले बयान भी ख़ूब वायरल हुए हैं। योगेन्द्र यादव ने ऐलान ही किया है कि - “अब इस देश में डेमोक्रेसी का भविष्य संसद से तय नहीं होगा, सड़क से होगा, इलेक्शन से तय नहीं होगा, Resistance से होगा।”
वहीं प्रशांत भूषण एक्स स्पेस में कह ही चुके हैं कि - “ऑप्शंस तो यही हैं कि भई हम रेवोल्यूशन के थ्रू कुछ करा लें। अब उस रेवोल्यूशन में तो बहुत ख़ून खराबा होएगा। क्योंकि अभी तो ये लोग पुलिस इस्तेमाल कर रहे हैं। पैरामिलिट्री। इन लोगों ने गन वगैरह यूज़ नहीं करी हैं।पर वो सब भी यूज़ करेंगे। आर्मी को भी बुला सकते हैं। ”
इन दोनों बयानों को गंभीरता के साथ समझिए। ये वही कहते हुए नज़र आ रहे हैं। जो नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालद्वीव में हुआ। क्या ये सीधे तौर पर हिंसा, अराजकता, उपद्रव को लेकर उकसाना नहीं है? क्या इकोसिस्टम के अनुसार अब भारत में लोकतंत्र वोट के ज़रिए नहीं 'बुलेट और ब्लड' के ज़रिए चलेगा?
इस इकोसिस्टम का उद्देश्य ही यही समझ आता है कि एक बार धोखे से कहीं गोली चल जाए। कोई जनहानि हो जाए तो इसके बाद ये देश में दंगे, हिंसा फैला सकें।
•क्या कांग्रेस नेतृत्व वाला इकोसिस्टम सत्ता के लिए हिंसा, अराजकता , एल'न मस्क, सो-रोस और बां'ग्लादेश, रो-हिंग्या, घुसपैठिए जो भी साथ आएंगे। जो भी भारत के लोकतन्त्र और सम्प्रभुता पर हमला करेंगे। क्या इन्हें उनके साथ होने में कोई गुरेज नहीं है? क्योंकि यही ग्लोबल एजेंडा है। इन्हें ये तकलीफ़ है कि - भारत क्यों दुनिया में नई शक्ति बने? क्यों ग्लोबल साउथ का शक्ति केंद्र बने? भारत में शांति और स्थिरता क्यों रहे? क्या इनका ये उद्देश्य है कि भारत के उद्योग और उद्योगपति नष्ट हो जाएं?ताकि दुनिया के सामने भारत को झुकना पड़े?
वैसे, जनता इन्हें बारंबार चुनाव में शिकस्त देती है। जनहित के मुद्दों पर, लोककल्याण पर जनता द्वारा हर बार मात खाए हुए सत्ता के भूखे ये लोग क्या किसी भी स्तर तक गिर सकते हैं?क्या इनके लिए देश से बड़ी 'सत्ता' हो सकती है?
नीट को लेकर जंतर-मंतर में हुए आंदोलन से लेकर अब तक के प्रकरण को देखिए। फिर SIR को लेकर इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर देखिए। किसी मुद्दे को कैसे जनरेट किया गया ये गंभीरता के साथ देखिए?सत्य, तथ्य और सुप्रीम कोर्ट में मामला ; ये सब कहीं किनारे है। लेकिन ये देखिए कि - सीजेपी कैसे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ आंदोलन को लेकर आगे आती है। फिर कांग्रेस इकोसिस्टम कैसे एक्टिव होता है?इसके बाद मानवाधिकार, पत्रकार, आदि के नाम पर राहुल गांधी कैसे सुप्रीम कोर्ट के मार्च के लिए आगे आते हैं? ठीक वैसे ही जैसे पिछली बार राहुल गांधी - सीजेपी के तथाकथित प्रोटेस्ट के बाद फुली एक्टिवेट हुए थे। अराजकता की पूरी बागडोर ख़ुद के हाथों लेने आ गए थे।
इस क्रोनोलॉजी को समझिए कि - ये सीजेपी, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी, टीएमसी, वामपंथी संगठन, (AISA, SFI जैसे स्टूडेंट्स विंग, पत्रकार के भेष में कांग्रेस फंडेड इन्फ्लुएंसर, यूट्यूबर्स समेत, कांग्रेस शासन काल के पालतू मीडिया ग्रुप के कोर मेंबर्स। ये सब अभी कांग्रेस की ही टीम हैं जिन्होंने सिर्फ़ अलग-अलग मुखौटे पहने हैं। इनका कॉमन एजेंडा एक है। वो भारत की हर सांविधानिक संस्थाओं पर हमला करना। अराजकता, हिंसा फैलाना। जनता में भय और अविश्वास फैलाना। जनता द्वारा चुनी गई सरकार को अराजकता के ज़रिए हटाना। हाल फ़िलहाल ये इसलिए एकजुट हैं क्योंकि 2027 में उत्तरप्रदेश में चुनाव हैं। इन्हें लगता है कि ये सब करके वो कुछ नया कर पाएंगे।
•किन्तु, इन्हें भारत की शक्ति और सामर्थ्य नहीं मालूम है। बाबा साहेब डॉ अंबेडकर जिस 'Grammar Of Anarchy' के बारे में बता गए थे। उसे ये देश अच्छी तरह से जान रहा है। देश जानता है कि जोकर का प्रहसन कब तक और कितनी देर तक देखना चाहिए।
संविधान ने अगर इस अराजक भीड़ को अपनी आवाज़ उठाने की आज़ादी दी है तो ये मत भूलिए कि - पूरा देश सोया नहीं हुआ है।वो बस हर चीज़ को बारीकी से देख और समझ रहा है। वो ज़वाब देना जानता है। किसी अराजक नेता, अराजक भीड़ में हिम्मत नहीं है कि - वो भारत को बंधक बना लेगा। ये देश भारत के संविधान और उसकी सांविधानिक कार्य प्रणाली से चलता है। न कि सत्तालोलुप किसी ख़ानदानी शहजादे की सनक से। राष्ट्रभक्त जनता शांत है इसका कतई अर्थ ये नहीं है कि - वो ज़वाब देना नहीं जानती है। ये भूल जाइए कि कोई भारत को नेपाल और बांग्लादेश बना पाएगा। भारत की जनता अपना अच्छा और बुरा भली-भांति ढंग से जानती है। बाक़ी डीप स्टेट नामक जंतु तो कई सालों से भारत के ख़िलाफ़ जुटा है। लेकिन वो न तो मोदी को हटा पाया। न ही भारत की शक्ति को कम कर पा रहा है। ये ज़रूर है कि अराजकता के ऐसे लक्षण ज़रूर दिख रहे हैं। क्योंकि, सत्ता के भूखे इस इकोसिस्टम ने भारत की सुपारी ले ली है। इनका ये भ्रम भी टूट जाएगा। ये तय है कि भारत अब रुकने वाला नहीं है। किन्तु जनमानस का सजग और सतर्क रहना आवश्यक है। इनके मुखौटों को जानिए, पहचानिए और बेनकाब कीजिए।