-कैलाश चन्द्र
दिल्ली के जंतर-मंतर पर कभी एक मुद्दे पर प्रदर्शन होता है, तो कभी दूसरे मुद्दे पर। कई बार अलग-अलग संगठनों, राजनीतिक दलों, सामाजिक समूहों और कार्यकर्ताओं की माँगें भी एक ही स्थान पर दिखाई देती हैं। प्रश्न यह है कि क्या हम इन आंदोलनों को केवल अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखेंगे, या इनके पीछे के विचार, नेतृत्व, उद्देश्य और संभावित परिणामों को भी समझेंगे?
कुछ प्रश्न हैं, जिन पर समाज को गंभीरता से विचार करना चाहिए।
1. FCRA का विरोध क्यों?
विदेशी अंशदान नियमन अधिनियम (FCRA) विदेश से मिलने वाले धन पर नियंत्रण और उसके उपयोग को विनियमित करता है। वर्ष 2026 के प्रस्तावित संशोधनों का सरकार ने पारदर्शिता और धन के उचित उपयोग से संबंध बताया, जबकि विपक्षी दलों और कुछ नागरिक संगठनों ने संस्थाओं की स्वायत्तता तथा सरकारी अधिकारों के दुरुपयोग की आशंका जताई।
इसलिए सवाल केवल विरोध करने वालों का नहीं, बल्कि यह भी है कि विदेशी धन कहाँ से आता है, किस उद्देश्य से खर्च होता है और उसका हिसाब कितना पारदर्शी है। राष्ट्रीय हित, सामाजिक सेवा और संस्थाओं की स्वतंत्रता—तीनों पर तथ्यों के आधार पर चर्चा होनी चाहिए।
2. SIR का विरोध किसलिए?
मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) का उद्देश्य मतदाता सूची की जाँच और सुधार करना है। विरोध करने वाले दलों और समूहों का आरोप है कि इस प्रक्रिया में पात्र मतदाताओं के नाम छूट सकते हैं। निर्वाचन व्यवस्था के समर्थकों का तर्क है कि मतदाता सूची की शुद्धता आवश्यक है।
यहाँ दो बातें स्पष्ट होनी चाहिए - किसी भी पात्र भारतीय नागरिक का नाम गलत तरीके से नहीं कटना चाहिए और किसी अपात्र व्यक्ति का नाम भी मतदाता सूची में नहीं रहना चाहिए।
दिल्ली जाकिर नगर, औखला, जाफराबाद और अपोलो हॉस्पिटल के आस पास, पीछे के इलाकों के वाटसप पर इन आंदोलन में अवैध बांग्लादेशी, रोहिंग्या या पाकिस्तानी नागरिकों को भारत में बसाने की माँग पूरी होना बताया जा रहा है। यदि ये इस्तीफा होगा तो ये सरकार हटेगी, नई सरकार बनेगी ऐसा वातावरण बनाया गया है। बिना तथ्यों के, सोशल मीडिया में परोसकर भड़काया जाना ठीक नहीं है। उसके समर्थन में दस्तावेज, वक्तव्य और प्रमाण सामने आने चाहिए। इस समूह से सभी प्रदर्शनकारियों को जोड़ना उचित नहीं होगा।
3. क्या शाहीनबाग और जंतर-मंतर के आंदोलनों को एक ही अभियान माना जाए?
शाहीनबाग आंदोलन को आज के विभिन्न प्रदर्शनों के बीच देख सकते है। कल दिनभर जो लोग आये थे वो कह रहे थे कि हम शाहीनबाग करने आये है। इन लोगों का उनसे संगठनात्मक संबंध होने का दावा किया जा सकता है, लेकिन उसे प्रमाणित करना आवश्यक है। किन संगठनों ने भाग लिया, नेतृत्व किसके हाथ में था, धन कहाँ से आया और वास्तविक माँगें क्या थीं - इन प्रश्नों की जाँच होनी चाहिए।
सिर्फ समान नारे, समान स्थान या समान राजनीतिक विरोध से किसी एक साझा योजना का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। फिर भी, विभिन्न आंदोलनों के बीच यदि कोई वास्तविक समन्वय है, तो उसे समझना नागरिकों का अधिकार है।
4. परिसीमन का विरोध क्यों?
परिसीमन का संबंध निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के निर्धारण और संसद तथा विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व से है। इस विषय पर किसी भी प्रस्ताव का मूल्यांकन जनसंख्या, राज्यों के प्रतिनिधित्व, संघीय संतुलन और संवैधानिक व्यवस्था के आधार पर होना चाहिए।
विरोध करने वालों की वास्तविक आपत्तियाँ क्या हैं? क्या वे प्रतिनिधित्व के असंतुलन की बात कर रहे हैं, राज्यों के अधिकारों की, या किसी राजनीतिक परिणाम की आशंका जता रहे हैं? इन सबका अलग-अलग उत्तर खोजा जाना चाहिए।
5. संसद में आने वाले विधेयकों का सड़क पर विरोध
शिक्षा सुधार हो, विदेशी अंशदान से जुड़ा कानून हो या कोई अन्य विधायी प्रस्ताव - लोकतंत्र में सरकार को कानून बनाने का अधिकार है और नागरिकों को उसका विरोध करने का भी अधिकार है।
लेकिन एक नागरिक के रूप में हमारा प्रश्न होना चाहिए कि विरोध का वास्तविक कारण क्या है? विधेयक की किसी धारा से असहमति है? उसके क्रियान्वयन में कठिनाई है? किसी वर्ग के हित प्रभावित होते हैं? या विरोध का उद्देश्य सरकार के प्रत्येक निर्णय को अस्वीकार करना है?
हर विधेयक का अध्ययन किए बिना केवल नारों के आधार पर समर्थन या विरोध करना समाज के हित में नहीं है।
अब सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न
क्या हमें केवल आंदोलन की तस्वीरें, नारे और सोशल मीडिया संदेश देखकर अपनी राय बना लेनी चाहिए?
या हमें पाँच बातें जाननी चाहिए - आंदोलन कौन चला रहा है, उसकी माँग क्या है, उसे संसाधन कहाँ से मिलते हैं, उसके तर्क कितने प्रमाणित हैं और उसकी माँग पूरी होने पर देश तथा समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
वैश्विक बाजारवादी शक्तियों के प्रवाह में सभी नया स्टेटस बनाने में लगे है हिंदू परिवार अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिये कमाने में व्यस्त है। बच्चे LGBTQAI++ के समर्थन वाली वेब सीरीज, फिल्मों और OTT पर नया समाज बनाने में लगा है। अधिक सुविधाओं में कुछ नया करने के चक्कर में 'गे-लेस्बियन' बन रहे है। लिंग परिवर्तन की योजना बना रहा है। इसलिये समाज को नेट फेलिक्स के संजाल से बाहर आना है। प्रत्येक भारतीय नागरिक को भावनाओं के साथ विवेक, नारों के साथ तथ्य और विरोध के साथ उसके परिणामों को भी समझना चाहिए।
किसी भी विषय पर आँख मूँदकर समर्थन करना उचित नहीं, और बिना जाँच हर विरोध को राष्ट्रविरोधी घोषित कर देना भी उचित नहीं। वास्तविक जागरूकता का अर्थ है - प्रत्येक विषय को समझना, प्रमाणों की जाँच करना और राष्ट्रीय हित तथा संवैधानिक अधिकारों के प्रति सजग रहना।
प्रश्न यह नहीं कि कौन सड़क पर है। प्रश्न यह है कि उसकी माँग क्या है, उनकी विषय की समझदारी भी है। उसके लिये तर्क क्या हैं और उसका सबपर परिणाम क्या होगा? इसका अधिकांश अभाव है।
हमें यह समझ विकसित करनी होगी कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार महत्त्वपूर्ण है और देशहित में सही-गलत का विवेक भी उतना ही महत्व का।
जाग्रत समाज वही है, जो केवल घटनाएँ ही नहीं आगे भी देखता - उनके पीछे के तथ्यों, विचारों और परिणामों को भी समझता है।