आतंकवाद पर भी वोट बैंक का चश्मा! रियाद पर हमले ने खोल दी कांग्रेसी चयनात्मक संवेदना की पोल

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    12-Oct-2026
Total Views |
आतंकवाद पर भी वोट बैंक का चश्मा! रियाद पर हमले ने खोल दी कांग्रेसी चयनात्मक संवेदना की पोल
 
 
 
डॉ. मयंक चतुर्वेदी
वरीष्‍ठ पत्रकार  
 
 
गाजा पर आंसू, रियाद पर खामोशी! क्या निर्दोषों के खून का रंग भी राजनीतिक विचारधारा और वोट बैंक देखकर तय किया जाएगा? क्या आतंकवाद की निंदा भी अब इस गणित से होगी कि हमलावर किस मजहब का है, पीड़ित किस देश का है और विरोध करने से किसका राजनीतिक समीकरण बिगड़ सकता है? सऊदी अरब की राजधानी रियाद पर हूती विद्रोहियों के हमले को लेकर विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने भारतीय राजनीति के सामने यही असहज सवाल खड़ा किया है। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा और एआईएमआईएम अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी सहित फिलिस्तीन के समर्थन में मुखर रहने वाले नेताओं से उनका सवाल है कि निर्दोष नागरिकों पर हमले के इस प्रसंग में उनकी आवाज कहां है?
 
 
वस्‍तुत: यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि राजनीति में नैतिकता की वास्तविक परीक्षा अपने पसंदीदा पक्ष के समर्थन में भाषण देने के स्‍थान पर असुविधाजनक परिस्थितियों में भी सही के साथ खड़े होने से होती है। गाजा में निर्दोष नागरिकों की मौत पर आवाज उठाना मानवीय दायित्व है। रियाद में नागरिकों पर हमले की निंदा करना भी उतना ही बड़ा दायित्व है। एक के लिए संवेदना और दूसरे के लिए मौन! निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाना अपराध है। आतंकवादी हिंसा का विरोध सार्वभौमिक होना चाहिए, चयनात्मक नहीं।
 
 
गाजा पर संसद से सड़क तक आवाज, रियाद पर सवालों से परहेज क्यों?
 
यहां हम सभी ने देखा है कि कैसे फिलिस्तीन के मुद्दे पर भारतीय राजनीति में लंबे समय से बहस होती रही है। कांग्रेस सहित विपक्ष के अनेक नेताओं ने फिलिस्तीनियों के अधिकारों और गाजा के मानवीय संकट पर अपनी बात रखी है। प्रियंका गांधी वाड्रा फिलिस्तीन के समर्थन में सार्वजनिक रूप से अपना रुख व्यक्त कर चुकी हैं। असदुद्दीन ओवैसी ने लोकसभा में शपथ के दौरान ‘जय फिलिस्तीन’ का नारा लगाया था, जिस पर व्यापक राजनीतिक विवाद हुआ था।
 
 
इन घटनाओं के संदर्भ में विनोद बंसल का सवाल सीधा है, “यदि फिलिस्तीन के समर्थन में राजनीतिक मुखरता दिखाई जा सकती है, तो रियाद पर हमले की निंदा में समान स्पष्टता क्यों अपेक्षित न हो? क्या निर्दोष नागरिकों की सुरक्षा का सिद्धांत हर देश और हर संघर्ष पर समान रूप से लागू नहीं होना चाहिए?” एक तरह से देखा जाए तो यहां किसी नेता के लिए कठिनाई का कोई कारण नहीं होना चाहिए। वह गाजा के नागरिकों के अधिकारों का समर्थन करते हुए हूती विद्रोहियों की हिंसा की निंदा कर सकता है। वह इजराइल की किसी कार्रवाई की आलोचना करते हुए सऊदी अरब पर हमले को भी गलत बता सकता है। दोनों रुखों में कोई विरोधाभास नहीं है, किंतु विरोधाभास तब पैदा होता है, जब सिद्धांत की जगह राजनीतिक सुविधा लेने लगती है।
 
 
क्या आतंकवाद के सामने भी मजहबी और राजनीतिक समीकरण देखे जाएंगे?
 
मध्य-पूर्व के संघर्ष जटिल हैं। सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच टकराव के पीछे क्षेत्रीय शक्ति-संघर्ष, सुरक्षा संबंधी चिंताएं और लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक विवाद हैं। इन जटिलताओं को समझना आवश्यक है, लेकिन इनका उपयोग नागरिकों पर हमले को उचित ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता। कमाल की बात यह है कि दोनों ओर ही इस्‍लामिक हैं, जिनका इस्‍लाम इन हमलों से खतरे में नहीं पड़ता! मासूमों की जान जाने के बाद भी कहीं कोई विरोध की आवाज दुनिया के 56 से अधिक देशों से नहीं उठती! किंतु भारत जैसे बहुलतावादी लोकतंत्र में राजनीतिक दलों और धार्मिक संगठनों की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। इसलिए ही केंद्र की मोदी सरकार की ओर से तो हूती हमलों का विरोध किया गया है और इस तरह से भारत ने यह बताया भी है कि मानवाधिकारों की रक्षा प्रत्‍येक समुदाय और प्रत्येक मनुष्य का अधिकार है। आतंकवाद के विरुद्ध नैतिक स्पष्टता ही सामाजिक विश्वास को मजबूत करती है।
 
 
मक्का-मदीना का प्रश्न और नैतिक जवाबदेही
 
सऊदी अरब में मक्का और मदीना स्थित हैं, जिन्हें इस्लाम के दो सबसे पवित्र शहर माना जाता है। दुनिया भर के मुसलमानों के लिए इनका विशेष धार्मिक महत्व है। इस संदर्भ में रियाद पर हमले को लेकर उठे सवाल धार्मिक (मजहबी) संगठनों के सार्वजनिक रुख पर भी चर्चा को आमंत्रित करते हैं। यदि कोई संगठन वैश्विक मुस्लिम समुदाय के अधिकारों और हितों की बात करता है, तो उससे अपेक्षा की जा सकती है कि वह सऊदी अरब सहित किसी भी देश में निर्दोष नागरिकों पर हमले की स्पष्ट निंदा करे।
 
 
दूसरी ओर खाड़ी क्षेत्र भारत के लिए केवल ऊर्जा आपूर्ति का स्रोत हैं। वहां लाखों भारतीय नागरिक रोजगार करते हैं, अपने परिवारों के लिए धन भेजते हैं और भारत की अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं। क्षेत्रीय अस्थिरता उनके जीवन, आजीविका और सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है, इसलिए रियाद पर हमले की निंदा किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष का प्रश्न भर नहीं है। यह नागरिक सुरक्षा, आतंकवाद के विरोध और भारत के राष्ट्रीय हितों से जुड़ा विषय है। भारत सरकार का आधिकारिक रुख महत्वपूर्ण है, किंतु राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक दलों की अपनी नैतिक जिम्मेदारी भी बनी रहनी चाहिए जोकि फिलहाल कांग्रेस एवं अन्‍य कुछ संगठनों की ओर से इस मुद्दे पर नजर नहीं आ रही है।
 
 
वस्‍तुत: जो दल यूक्रेन, गाजा या दूसरे अंतरराष्ट्रीय संकटों पर अपनी स्वतंत्र राय रखते हैं, वे रियाद पर हमले के मामले में भी अपना स्पष्ट रुख रखें। वस्‍तुत: यहां कहना यही है कि विनोद बंसल ने प्रियंका गांधी वाड्रा, असदुद्दीन ओवैसी और फिलिस्तीन के मुद्दे पर सक्रिय रहने वाले राजनीतिक नेतृत्व के सामने जो प्रश्न रखे हैं, उनका उत्तर आरोप-प्रत्यारोप से आगे जाकर दिया जाना चाहिए। क्या वे रियाद पर हमले की स्पष्ट निंदा करते हैं? क्या वे मानते हैं कि आतंकवाद के विरुद्ध एक ही नैतिक कसौटी सभी पक्षों पर लागू होनी चाहिए?
 
 
इन प्रश्नों का उत्तर देना फिलहाल इस घटना पर चुप्‍पी साधे बैठे नेताओं के सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही की सामान्य मांग है। बेशक! लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को अपनी विचारधारा रखने का अधिकार है, लेकिन विचारधारा निर्दोषों की पीड़ा के प्रति उदासीनता का औचित्य नहीं बन सकती। आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई तब कमजोर होती है, जब अपराधी की पहचान देखकर प्रतिक्रिया तय की जाती है। यदि गाजा पीड़ितों के लिए आवाज उठाना सही है तो रियाद के पीड़ितों के लिए आवाज उठाने में संकोच क्यों हो?
 
 
आतंकवाद का कोई स्वीकार्य रूप नहीं होता। निर्दोषों की हत्या का कोई राजनीतिक औचित्य नहीं होता। और मानवता का कोई वोट बैंक नहीं होता। यदि भारतीय राजनीति इन तीन सरल सत्यों को स्वीकार कर ले, तो अंतरराष्ट्रीय संकटों पर उसका विमर्श अधिक विश्वसनीय, अधिक नैतिक और अधिक प्रभावी हो सकता है। अन्यथा जनता को यह पूछने का अधिकार रहेगा कि नेताओं की संवेदना वास्तव में मानवता के लिए है या उन मुद्दों के लिए, जिनसे उन्हें राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना दिखाई देती है। जिसे मोटी भाषा में चयनात्‍मक राजनीति कहा जाता है।