शारदेय नवरात्रि: शक्ति साधना का आध्यात्मिक विज्ञान

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    12-Oct-2026
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शारदेय नवरात्रि: शक्ति साधना का आध्यात्मिक विज्ञान -१
 
 
 
-डॉ. नितिन सहारिया
 
युगऋषि ,वेदमूर्ति पं श्रीराम शर्मा आचार्य के अनुसार पुराणों में उल्लेख है कि- सूर्यलोक में देवताओं के पास कामधेनु गौ है, वह अमृतोपम दूध देती है ।। जिसे पीकर देवता लोग सदा सन्तुष्ट, प्रसन्न तथा सुसम्पन्न रहते हैं, इस गौ में यह विशेषता है कि उसके समीप कोई अपनी कुछ कामना लेकर आता है, तो उसकी इच्छा तुरन्त पूरी हो जाती है ।।
 
 
नैराश्य रूपी अंधकार का नाश करते हुए सकारात्मकता रूपी नव ऊर्जा से भरकर जीवन को नवीनता प्रदान करना ही नवरात्रि पर्व का मुख्य संदेश है। जीवन में काम, क्रोध, लोभ, मोह का समावेश ही घनघोर रात्रि के समान है जिसमें प्रायः जीव उचित मार्ग के अभाव में भटकता रहता है।
 
 
हमारे शास्त्रों में अज्ञान और विकारों को एक विकराल रात्रि के समान ही बताया गया है। इन दुर्गुण रूपी रात्रि के समन के लिए व जीवन को एक नईं दिशा, नईं उमंग, नया उत्साह देने के साधना काल का नाम ही नवरात्र है। माँ दुर्गा साक्षात ज्ञान का ही स्वरूप है और नवरात्र में माँ दुर्गा की उपासना का अर्थ ही ज्ञान रूपी दीप का प्रज्ज्वलन कर जीवन से अज्ञान के तिमिर का नाश करना है।
 
 
कल्पवृक्ष के समान कामधेनु गौ भी अपने निकट पहुँचने वालों की मनोकामना पूरी करती है ।। यह कामधेनु गौ गायत्री ही है ।। इस महाशक्ति की जो देवता, दिव्य स्वभाव वाला मनुष्य उपासना करता है ।। वह माता के स्तनों के समान आध्यात्मिक दुग्ध धारा का पान करता है, उसे किसी प्रकार कोई कष्ट नहीं रहता ।। आत्मा स्वतः आनंद स्वरूप है ।। आनंद मग्न रहना उसका प्रमुख गुण है ।। दुःखों के हटते और मिटते ही वह अपने मूल स्वरूप में पहुँच जाता है ।। देवता स्वर्ग में सदा आनंदित रहते हैं ।। मनुष्य भी भूलोक में उसी प्रकार आनन्दित रह सकता है, यदि उसके कष्टों का निवारण हो जाए ।। गायत्री / आदीशक्ति -कामधेनु मनुष्य के सभी कष्टों का समाधान कर देती है ।
 
 
शारदेय नवरात्रि केवल एक त्योहार नहीं, भारतीय ज्ञान परम्परा में आत्म-परिष्कार का नौ दिवसीय विज्ञान है। वर्ष की दोनों नवरात्रियों में शारदीय नवरात्रि का विशेष महत्व है, क्योंकि यह ऋतु-संधि पर आती है।
 
1. प्रकृति और अध्यात्म का संगम:
 
शरद ऋतु में दिन छोटे और रातें बड़ी होने लगती हैं। आयुर्वेद के अनुसार इस काल में पित्त दोष का प्रकोप बढ़ता है। इसीलिए हमारे ऋषियों ने इस काल में उपवास, सात्विक आहार और संयम का विधान किया। उपवास से शरीर का शोधन और मंत्र जप से मन का शोधन, दोनों एक साथ होते हैं।
 
2. नौ दिन - नौ चक्रों की यात्रा:
 
नौ दुर्गा केवल बाहरी देवियां नहीं, हमारे अंतःकरण की नौ शक्तियां हैं:
- शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक: यह यात्रा मूलाधार से सहस्रार तक की यात्रा है। पहले तीन दिन तमस (महाकाली), अगले तीन दिन रजस (महालक्ष्मी) और अंतिम तीन दिन सत्व (महासरस्वती) की साधना के हैं। साधक पहले अपने विकारों को नष्ट करता है, फिर सद्गुणों को धारण करता है, और अंत में ज्ञान को प्राप्त करता है।
 
3. शक्ति का दार्शनिक अर्थ:
 
'दुर्गा' शब्द का अर्थ है - दुर्गम किले की रक्षा करने वाली। हमारे भीतर काम, क्रोध, लोभ, मोह का जो दुर्गम किला है, उसकी रक्षा करने वाली चेतना ही दुर्गा है। महिषासुर कोई बाहर का असुर नहीं, हमारे भीतर का अहंकार है जो विभिन्न रूप धारण कर लेता है।
4. अनूपपुर-महाकौशल में विशेष महत्व:
 
महाकौशल की जनजातीय परम्परा में नवरात्रि को 'जस' और 'जवारा' के रूप में मनाया जाता है। बैगा और गोंड समाज में जवारा बोकर प्रकृति की सृजन शक्ति की पूजा होती है। यह वही कृषि-ऋषि परम्परा है जो वैदिक 'शाकंभरी' की अवधारणा से मिलती है। अमरकंटक की नर्मदा और सोन की घाटियों में शारदीय नवरात्रि पर आज भी देवी गीतों में आद्याशक्ति की लोक-व्याख्या सुनने को मिलती है।
 
शारदीय नवरात्रि हमें सिखाती है कि शक्ति बाहर से नहीं आती, वह जागृत होती है। नौ दिन का अनुशासन, संयम और भक्ति हमें 'देह से देव' तक की यात्रा कराता है। यही कारण है कि इस साधना के बाद दशमी को विजयादशमी मनाई जाती है - अपने ऊपर विजय का पर्व।
 
यह दुर्गा सप्तशती के अध्याय 5 का सबसे प्रसिद्ध और सर्वमान्य स्तुति मंत्र है:
 
> या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
> नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
 
अर्थ: जो देवी समस्त प्राणियों में चेतना (जीवन-शक्ति) के रूप में विद्यमान हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
यह मंत्र 1 श्लोक नहीं, बल्कि कई रूपों में आता है, सप्तशती में इसी को 5 बार अलग-अलग भावों में कहा गया है:
 
1. शक्ति रूप में: या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता...
2. बुद्धि रूप में: या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता...
3. निद्रा रूप में: या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता...
4. क्षुधा रूप में: या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता...
5. लज्जा रूप में: या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता...
 
जप विधि: शारदीय नवरात्रि में प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद 108 बार इस मंत्र का जप अत्यंत फलदायी माना जाता है। इसका भाव यह है कि माँ को हम हर जीव में देखें।
 
> ॐ नमोस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये
> सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे।
> सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते
> सहस्रकोटि युगधारिणे नमः॥
 
अर्थ: हे अनन्त, हे सहस्त्र रूप वाले, सहस्त्र चरण, नेत्र, सिर और भुजाओं वाले, सहस्त्र नाम वाले, शाश्वत पुरुष- परमात्मा , जो सहस्त्र करोड़ युगों को धारण करते हैं, आपको कोटि -कोटि नमस्कार है।
 
शुभम् भवतु!
जय भवानी! जय माँ दुर्गे!