रेणुका पिंगले
राष्ट्र सेविका समिति
मालवा प्रांत संपर्क प्रमुख
धैर्य यह एक मानसिक अवस्था है, जो किसी भी विपरित परिस्थिति में मन को तुरंत प्रतिक्रिया देने से रोकती है। मानव शरीर के साथ सुख और दुःख दोनों की ही अनुभूति होना अनिवार्य है। यह दोनो जीवन का अटूट हिस्सा है। यह दोनों सहने के लिए भी धैर्य की आवश्यकता होती है। धैर्य को समझने के लिए पहले अधीरता को समझना होगा। अधीर मन धैर्य के अभाव मे ऐसी प्रतिक्रिया देने के लिए बुद्धि को प्रेरित करता है, जिसके कारण जीवन की दिशा बदल जाती हैं।
मनुष्य के जीवन में परिस्थिति का सामना करने के लिए अनेक विकल्प होते है, परंतु आप किस विकल्प का चयन करे यह आपका मन तय करता है। अधीर मन बिना अधिक विचार किए ऐसे विकल्प चुन सकता है जिससे तुरंत प्रतिक्रिया होकर आप साधारण व्यक्तित्व का उदाहरण प्रस्तुत करते है, तो धैर्यशील मन शांत रहकर विचार कर ऐसे विकल्प का चयन करता है जिससे आप उच्चस्तरीय व्यक्तित्व का उदाहरण प्रस्तुत कर सकते हैं।
पौराणिक काल में नारी की अधीरता के कुछ ऐसे उदाहरण प्रस्तुत है जिससे उनका व्यक्तिगत या सामाजिक अहित हुआ है। शुभकाल की प्रतिक्षा कर ऋषि कश्यप से अदिती ने देवताओं को जन्म दिया, परंतु दिती कामेच्छा से इतनी अधीर हुई कि उसने अशुभकाल में ही गर्भधारण की इच्छा रखी। पति ऋषि कश्यप द्वारा समझाने के बाद भी दिती की अधीरता कम न हुई और उसने दैत्यों को जन्म दिया।
कद्रू के अंडे पहले फूटकर उसे अपने सर्पपुत्र प्राप्त हुए, परंतु विनता के अंडे नही फुटें। तुलना करने के कारण विनता का मन अधीर हो उठा और उसने समय से पहले अपना एक अंडा फोडा जिससे दिव्यांग बालक अरूण पैदा हुआ।
अपनी पुत्री को अधिक शक्तिशाली पुत्र प्राप्त करनेवाला प्रसाद मिला है यह सोचकर गाधी राजा की रानी ने पुत्री को मिला प्रसाद स्वयं खा लिया और पुत्री को स्वयं के लिए रखा हुआ प्रसाद दे दिया जिसके कारण राजपुत्र होते हुए भी विश्र्वामित्र महर्षि बनें व परशुराम जी ऋषिपुत्र होने के बाद भी क्षत्रिय तेज को प्राप्त कर लिए। कुंती और गांधारी एक ही समय गर्भवती रहीं।
गांधारी की तीव इच्छा थी कि पहले उसे ही पुत्रप्राप्ती हो और वह राजा बनें, परंतु कुंती ने युधिष्ठिर को जन्म दिया और युधिष्ठिर ज्येष्ठ पुत्र कहलाए। इस कारण अधीर होकर गांधारी ने स्वयं ही अपने गर्भ पर प्रहार कर उसे गिराया। इस गिरे हुए गर्भ को वेदव्यास ऋषि ने एक सौ मृत्तिका कुंभों में रखा जिसके पश्र्चात कौरवों का जन्म हुआ।
वे भी अपनी माता की तरह ही सत्ता पाने के लिए अधीर थे। धृष्टद्युम्न राजा की पत्नी ने अधीर होकर विश्र्वकर्मा द्वारा जगन्नाथ की काष्ठ मुर्ति जिस कक्ष मे बन रही थी उस कक्ष का दरवाजा खोला तो विश्र्वकर्मा चले गए व जगन्नाथ की आधी मूर्ति बनी जिसके दर्शन हम आज करते हैं।
आधुनिक युग में वाय फाय का चलते चलते एकदम बंद हो जाना, ट्राफिक जाम हो जाना, किसी ने ओवरटेक करना, किसी को अधिक गुण प्राप्त होना, रील्स पर अपेक्षा से कम लाईक्स आना, यह धैर्य की सीमाएं तोडते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में दस विशेष गुणों का वर्णन किया है जिसमें धैर्य भी सम्मिलित है। धैर्य व्यक्ति को किसी भी परिस्थिति में आकलन करने के लिए प्रेरित करता है।
अखिल भारतीय महिला संगठन राष्ट्र सेविका समिति ने भी अपनी प्रार्थना में महिला सुधीरा हो इस पर बल दिया है।
सुशीलाः सुधीराः समर्थाः समेताः
स्वधर्मे स्वमार्गे परं श्रद्धया
वयं भावि- तेजस्वि- राष्ट्रस्य धन्याः
जनन्यो भवेमेति देह्याशिषम्।।
हम सब सुशील, धैर्यसम्पन्न, सामर्थ्यसम्पन्न, संगठित और परम श्रद्धा के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए, अपने ध्येय मार्ग पर चलते हुए, इस तेजस्वी राष्ट्र की कृतार्थ निर्माणकर्ती बने। अतः हे जगदम्बे, हम विनम्र भाव से प्रार्थना करते हैं कि इस आकांक्षा एवं उद्देश्यों की पूर्ति हेतु हमें आवश्यक धैर्य, सामर्थ्य एवं बल मिले, ऐसा आशीष प्रदान करेंं।