या देवी सर्वभूतेषु स्मृतीरुपेण संस्थिता...

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    11-Oct-2026
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-डॉ. ब्रीज़ त्रिपाठी
 
विश्व की महानतम सनातनी परंपरा का एक भी पक्ष ऐसा नहीं है, जो वैज्ञानिकता और तर्क की कसौटी पर खरा न उतर सके। सैंकड़ों वर्ष से लेकर अब तक सक्रिय कई विरोधी शक्तियां अपने सभी षड़यंत्रों के उपरांत भी सनातन के शाश्वत सत्य वाले स्वरूप को ठीक से चुनौती भी नहीं दे सकी हैं। ऐसे में शक्ति के विविध रूपों की आराधना के पुण्य प्रतीक नवरात्रि पर ने भी उस प्रेरणा का संचार किया है, जिसमें माँ के अलग-अलग दिनों के अनुरूप ही भारतीय स्त्री ने विश्व में अलग-अलग स्थानों पर स्वयं को प्रखर शक्ति पुंज के रूप में स्थापित कर दिखाया है।
 
 
 
नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा होती है। मां शैलपुत्री को पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, उनकी पूजा करने से भक्तों को शक्ति, स्थिरता और आत्मविश्वास का आशीर्वाद मिलता है। यदि भूतकाल में वीरांगना लक्ष्मीबाई शक्ति की प्रतीक रहीं तो प्रातः स्मरणीय अहिल्या देवी ने सुशासन की स्थिरता के नए मापदंड स्थापित किए और रानी अवंति बाई तथा मां चेनम्मा रानी ने अपने शौर्य से लोगों के भीतर ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध संघर्ष के अद्भुत आत्मविश्वास का परिचय दिया।
 
 
 
नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। मां का यह स्वरूप तप, त्याग और संयम का प्रतीक माना जाता है। इसके अनुसार ही यदि माता सीता से लेकर अहिल्या और मीरा देवी ने तप के महत्व को स्थापित किया तो पन्ना धाय और रानी पद्मावती त्याग तथा माता शबरी और लक्ष्मण जी की पत्नी उर्मिला संयम के कालजयी सजीव प्रतिबिम्ब स्थापित करने का माध्यम बन गईं। नौ पुनीत दिनों में जब मस्तक पर अर्धचंद्र धारण किए मां चंद्रघंटा का पूजन किया जाता है, तब ध्यान सहसा ही अंतरिक्ष को छूने वाली हमारी आदर्श दिवंगत कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स की प्रेरणादायी सफलताओं की तरफ जाता है। चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा की जाती है। मां कूष्मांडा को ऊर्जा और सृजन शक्ति का स्वरूप माना जाता है। इस पृथ्वी ने मां कूष्मांडा की भक्ति वाली ऊर्जा को देश की पहली महिला डॉक्टर आनंदी बाई जोशी सहित पहली महिला शिक्षिका शांति बाई फुले के रूप में पाया और सृजन शक्ति का सर्वाधिक सामयिक उदाहरण भारतीय महिला क्रिकेट टीम की वह एक-एक सदस्य बनीं, जिन्होंने इस खेल में देश को विश्व विजेता का खिताब दिला कर सारी दुनिया को भारतीय नारी की शक्ति का एक बार फिर धमाकेदार परिचय दे दिया।
 
 
 
नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा होती है। उन्हें भगवान कार्तिकेय की माता माना जाता है। भक्त मां स्कंदमाता से बुद्धि, शांति और संतान सुख की कामना करते हैं। मां का यह स्वरूप ममता और वात्सल्य का प्रतीक भी माना जाता है। वही माता, जिसके मनोहरी रूप में हम माता कौशल्या से लेकर मां जानकी और आधुनिक काल में भीमाबाई रामजी सकपाल (भारत रत्न आदरणीय बाबा साहब अंबेडकर की माताश्री) और आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की माताजी हीराबेन जैसे विलक्षण उदाहरणों के महान व्यक्तित्व और कृतित्व से भी आज तक प्रेरणा लेते चले आ रहे हैं । छठे दिन पूजी जाने वाली मां कात्यायनी को शक्ति और साहस का स्वरूप माना गया है। वही शक्ति जो ब्रिटिश काल में बंगाल की बेटियों सुनीति चौधरी और शांति घोष ने देश-प्रेम के लिए प्रदर्शित की थी और वही साहस जो अपनी जीवनकाल में सुषमा स्वराज जी ने दिखाया और आज जिसका सशक्त प्रतिनिधित्व देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कर रही हैं।
 
 
 
नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की आराधना की जाती है। मां का यह स्वरूप देखने में उग्र माना जाता है, लेकिन भक्तों के लिए वे कल्याणकारी हैं। ठीक वैसे ही, जैसे प्रथम स्वाधीनता संग्राम में अपने क्रोध से अंग्रेजों के छक्के छुड़ा देने वाली झलकारी बाई ने कर दिखाया था। यदि अंग्रेज और उनके सेवक कुछ भारतीय झलकारी बाई के क्रोध से थर-थर कांपते थे, लेकिन झांसी की प्रजा रानी लक्ष्मीबाई की इन अभिन्न सहयोगी को हृदय से पूजती थी। उसी तरह, जैसे ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान को मां काली वाले संहारक क्रोध का परिचय देने वाली कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह को हर सच्चा देशभक्त पूरे हृदय के साथ किसी देवी जैसा सम्मान ही देता है।
 
 
 
अष्टमी के दिन मां महागौरी की पूजा होती है। मां महागौरी को शांति, पवित्रता और सौम्यता का स्वरूप माना जाता है। वही तीन तत्व, जिनके भारतीय उदाहरणों को किसी एक अवसर पर पूरी तरह गिना पाना असंभव है। इसके लिए किसी खास उदाहरण की जरूरत नहीं है। सनातन की हर वह स्त्री शांति की प्रतीक है, जो अपने परिवार और कुनबे में सामंजस्य के महायज्ञ में निरंतर अपने प्रयासों की आहुति अर्पित करती है। वही जो निजी जीवन में पवित्रता के तत्व को स्वयं धारण किए रहती है और इन्हें संस्कारों के रूप में अपनी संतानों तक भी प्रेषित कर देती है। जो सौम्य भाव से राष्ट्र, समाज और परिवार के लिए अपने दायित्वों को समूची निष्ठा और संकल्प के साथ पालन करती जाती है। आलेख में गिनाए गए तमाम उदाहरण हांडी के इक्का-दुक्का चावलों की तरह ही हैं। सच तो यह है कि भारतीय स्त्रियों ने अनगिनत वाले आंकड़े के अनुरूप अलग-अलग क्षेत्र में अपनी अनुकरणीय सफलताओं के प्रतिमान स्थापित किए हैं। इसलिए जब नवरात्रि के अंतिम दिन मां सिद्धिदात्री को पूजा जाता है, तब हृदय से भारतीय आदर्श नारियों के लिए इसी स्मरण का निनाद सुनाई देता है
 
 
'या देवी सर्वभूतेषु स्मृतीरुपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥'
 
 
 
...अंत में जिस विमर्श की आवश्यकता प्रतीत होती है, उसका सार यह कि ऊपर बताए गए दृष्टांतों के अनुरूप भारतीय नारी के आदर्श स्वरूप को और कितने नए आयाम प्रदान किए जाने चाहिए। वस्तुतः सही अर्थ वाली भारतीय नारी और आदर्श या फिर आदर्श और सही अर्थ वाली भारतीय नारी एक-दूसरे के पूरक हैं। सभ्यता के ज्ञात अध्यायों से लेकर अब तक निश्चित ही यह हुआ है कि भारतीय परिवेश को अंगीकार करने वाली स्त्री ने उच्च कोटि के आदर्शों की नई परिभाषा रची है। वह निरंतर ही उस बारहखड़ी को आकार दे रही है, जो संस्कार से सरोकार की डोर को और शक्ति प्रदान करती है। मनुस्मृति कहती है, 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः....यह महान कथन नारी के आदर्श पक्षों के पूजनीय होने के प्रति आग्रह को और ढृढ़ता का वरदान देता है। इसलिए तो नवरात्रि में मां के विविध रूपों के पूजन में भी हम चहुओर स्त्री हेतु स्तुति वाले भाव को भी सहज रूप से महसूस कर सकते हैं। उस स्पंदन के रूप में, जो हमारे ह्रदय के कण-कण को क्षण-क्षण यह आभास दिलाता है कि इस पूजने के भाव को चिरंजीवी बनाए रखना है। यह पंक्तियाँ अंतिम हैं, लेकिन इन्हें उपसंहार नहीं कहा जा सकता। क्योंकि सही अर्थ वाली स्त्री के सम्मान में चाहे जितना भी लिख/कह/बता दिया जाए, लेकिन इस सबकी संपूर्ण व्याख्या कर पाना संभव ही नहीं है। फिर चाहे सारी जमीन को कागज, पृथ्वी के समस्त जल को दवात और सृष्टि के समस्त वृक्षों को कलम ही क्यों न बना लिया जाए।
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