राष्ट्र निर्माण संस्थाओं से नहीं, नागरिकों के संस्कार और कर्तव्यबोध से होता है — दीपक बिस्पुते

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    30-Jan-2026
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vidisha pramukh jangoshthi
 
 
विदिशा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्ष की राष्ट्रसेवा यात्रा के उपलक्ष्य में बुधवार को रवींद्रनाथ टैगोर सांस्कृतिक भवन, विदिशा में एक प्रमुख जनगोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी का उद्देश्य संघ के शताब्दी कालखंड में समाज, राष्ट्र और संस्कृति के क्षेत्र में किए गए कार्यों तथा उसके वैचारिक योगदान पर गंभीर विमर्श करना रहा।
 
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह बौद्धिक शिक्षण प्रमुख श्री दीपक विस्पुते उपस्थित रहे। उनके साथ विभाग संघचालक माननीय श्री सुरेश देव एवं जिला संघचालक माननीय श्री खुमान सिंह रघुवंशी मंचासीन रहे।
 
अपने उद्बोधन में दीपक विस्पुते ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने स्थापना काल से ही राष्ट्र निर्माण, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक जागरण और सेवा कार्यों को अपने कार्य का केंद्र बनाया है। संघ की 100 वर्षों की यात्रा समर्पण, अनुशासन और राष्ट्र प्रथम की भावना से प्रेरित रही है। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के व्यक्तित्व और विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि संघ का कार्य केवल संगठन तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचने का सतत प्रयास है।
 
दीपक जी ने स्व आधारित जीवन मूल्यों - भाषा, भूषा, भोजन, भजन, भवन एवं भ्रमण पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि राष्ट्र निर्माण केवल संस्थाओं के माध्यम से नहीं होता, बल्कि प्रत्येक नागरिक के संस्कार, कर्तव्यबोध और सामाजिक समरसता से ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव है। उन्होंने समाज में एकता, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण को समय की आवश्यकता बताया।
 
उन्होंने हिंदू समाज के उत्थान पर बल देते हुए जातिगत भेदभाव से ऊपर उठकर हिंदुत्व की समरस भावना को अपनाने का आह्वान किया। साथ ही समाज में व्याप्त अव्यवस्थाओं की ओर संकेत करते हुए सुधारात्मक प्रयासों की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने नागरिकों से अपने गांव, शहर और मोहल्ले के स्तर पर जागरूक होकर पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छता को जीवन का हिस्सा बनाने का आग्रह किया।
 
युवाओं को संबोधित करते हुए दीपक जी ने कहा कि राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए सामाजिक कार्यों में सक्रिय सहभागिता निभाना आज के युवाओं का दायित्व है। उन्होंने कहा कि प्रबुद्धजन सेवा के माध्यम से समाज के लिए दीपक बनें और निरंतर प्रयास कर समाज को सशक्त करें। सेवा को उन्होंने भारतीय संस्कृति का मूल बताया और कहा कि भारत में सेवा हमेशा कर्तव्य के रूप में देखी गई है। बिना करुणा के सेवा संभव नहीं है।
 
उन्होंने कहा कि भारत आज विश्व पटल पर तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन अभी भी कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां गंभीर और निरंतर कार्य की आवश्यकता है। इस दायित्व को समाज के प्रबुद्ध वर्ग को आगे आकर निभाना होगा। हमारी संस्कृति प्रत्येक मनुष्य में परमात्मा का अंश देखती है, इसलिए समाज को हर व्यक्ति की चिंता करनी चाहिए।
 
गोष्ठी में बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन, सामाजिक कार्यकर्ता, युवा वर्ग, मातृशक्ति एवं शहर के गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। अंतिम सत्र में उपस्थित प्रबुद्धजनों की जिज्ञासाओं का समाधान श्री दीपक विस्पुते द्वारा किया गया। कार्यक्रम के समापन अवसर पर छोटे बालक-बालिकाओं द्वारा राष्ट्रगीत “वंदे मातरम्” का मधुर सामूहिक गायन प्रस्तुत किया गया।