देश को सशक्त बनाने की शुरुआत अपने घर से करें : रामदत्त चक्रधर

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    15-Jan-2026
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ग्वालियर। देश को सशक्त, सामर्थ्यशाली और विश्व गुरु बनाने की प्रक्रिया किसी बड़े मंच या सत्ता से नहीं, बल्कि प्रत्येक परिवार के संस्कारों से शुरू होती है। जब हर घर कर्तव्यनिष्ठ, संस्कारित और राष्ट्रबोध से जुड़ा होगा, तभी समाज और राष्ट्र अपने श्रेष्ठ स्वरूप में आगे बढ़ सकेगा। यह विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह रामदत्त चक्रधर ने व्यक्त किए। वे बुधवार को जीवाजी विश्वविद्यालय स्थित अटल बिहारी वाजपेयी सभागार में आयोजित “स्वर शतकम्” कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे।
 
स्वर शतकम आयोजन समिति, ग्वालियर द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ग्वालियर विभाग के संघचालक प्रहलाद सबनानी, जीवाजी विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. राजकुमार आचार्य, राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय की कुलगुरु प्रो. स्मिता सहस्त्रबुद्धे तथा आईआईटीटीएम के निदेशक प्रो. आलोक शर्मा विशेष रूप से उपस्थित रहे।
 
अपने उद्बोधन में श्री चक्रधर ने कहा कि संगीत केवल कला नहीं, बल्कि साधना है। इसके माध्यम से ईश्वर की अनुभूति संभव है। तानसेन के गुरु स्वामी हरिदास जैसे अनेक साधकों ने संगीत को आत्मिक उन्नति का माध्यम बनाया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार संगीत की साधना व्यक्ति को ऊंचाई तक ले जाती है, उसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी एक शताब्दी से सामाजिक साधना में रत है। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में विजयादशमी के दिन संघ का बीजारोपण किया था। प्रारंभ में उपहास, उपेक्षा और विरोध झेलने के बाद आज संघ को समाज में व्यापक स्वीकार्यता मिली है। संसद में भी अब हिंदुत्व पर खुलकर चर्चा हो रही है।
 
उन्होंने कहा कि आज भी कुछ लोग स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी और अन्य महापुरुषों के विचारों में हिंदुत्व को लेकर भेद करते हैं, लेकिन वह समय दूर नहीं जब समाज हिंदुत्व को एक समग्र सांस्कृतिक चेतना के रूप में देखेगा। डॉ. हेडगेवार का स्पष्ट मत था कि आत्मविस्मृत हिंदू समाज को पहले आत्मबोध कराना होगा। जब तक समाज संगठित, जागरूक और परमार्थी नहीं बनेगा, तब तक राष्ट्र का कल्याण संभव नहीं है।
 

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रामदत्त चक्रधर ने कहा कि एक समय ऐसा भी था जब हिंदू कहलाने में हीन भावना अनुभव की जाती थी, लेकिन संघ के सतत प्रयासों से आज लोग गर्व से अपनी पहचान स्वीकार कर रहे हैं। उन्होंने कोरोना काल का उल्लेख करते हुए कहा कि उस कठिन समय में जब कई अपने भी साथ नहीं दे पाए, तब संघ के स्वयंसेवकों ने बिना किसी भय के सेवा कार्य किया। उन्होंने न केवल मृतकों का विधि-विधान से अंतिम संस्कार कराया, बल्कि उनके पार्थिव शरीर परिजनों तक पहुंचाने का भी कार्य किया।
 
इतिहास के उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि भारत-पाक युद्ध के समय सीमा पर संघ के नगर कार्यवाह चंद्रप्रकाश सहित चार-पांच स्वयंसेवकों ने गोला-बारूद सेना तक पहुंचाने में अपने प्राणों की आहुति दी। भारत-चीन युद्ध के दौरान स्वयंसेवकों ने दिल्ली की यातायात व्यवस्था सत्रह दिनों तक संभाली। गोवा मुक्ति आंदोलन में भी स्वयंसेवकों की सक्रिय भूमिका रही। इन योगदानों को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने लगभग तीन हजार स्वयंसेवकों को गणतंत्र दिवस परेड में सम्मिलित होने का अवसर दिया था।
 
श्री चक्रधर ने कहा कि आने वाले समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ “पंच परिवर्तन” के माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का कार्य करेगा। इनमें सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, स्वबोध, नागरिक शिष्टाचार और कुटुंब प्रबोधन प्रमुख हैं। उन्होंने हिंदू समाज से संगठित होकर राष्ट्र निर्माण में सक्रिय सहभागी बनने का आह्वान किया।
 
कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथियों का स्वागत डॉ. संजय धवले, गोपी मंधान, चंद्रप्रताप सिकरवार, डॉ. रूबी गुप्ता और शिखर दीक्षित ने किया। एकल गीत की प्रस्तुति अनूप मोघे ने दी। कार्यक्रम का संचालन एसबी ओझा और निरुपम नेवासकर ने किया तथा आभार प्रदर्शन चंद्रप्रताप सिकरवार ने किया।
 
यह हुए पुरस्कृत
कार्यक्रम में गायन, वादन और नृत्य की आकर्षक प्रस्तुतियां हुईं। संस्कार भारती द्वारा 5 और 6 जनवरी को आयोजित विद्यालयीन और महाविद्यालयीन प्रतियोगिताओं के विजेताओं ने भी प्रस्तुति दी और उन्हें सम्मानित किया गया।
 
विद्यालयीन स्तर
प्रथम: ग्वालियर ग्लोरी
द्वितीय: पीडी कॉन्वेंट स्कूल
तृतीय: ईसीएस स्कूल
 
महाविद्यालयीन स्तर
प्रथम: आईटीएम
द्वितीय: राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय
तृतीय: जीवाजी विश्वविद्यालय
 
वाद्य वृंद से शक्ति का आह्वान
कार्यक्रम में राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने राग वैरागी भैरव में, आठ मात्रा ताल पर शास्त्रीय वाद्य वृंद की प्रभावशाली प्रस्तुति दी। मां दुर्गा के आह्वान से सभागार में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार हो गया।

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राग देस में वंदे मातरम् पर भरतनाट्यम
 
कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण राग देस, अठारह मात्रा ताल में वंदे मातरम् के गायन पर प्रस्तुत भरतनाट्यम रहा। गायन विभाग के छात्र-छात्राओं की इस भावपूर्ण प्रस्तुति ने सभागार में उपस्थित श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। कार्यक्रम के दौरान एक लघु वृत्तचित्र का प्रदर्शन भी किया गया, जिसने आयोजन को और प्रभावी बनाया।
 

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